
11.1.1979
प्रिय योगेन्द्र जी
आपका पत्र मिला । मैं कुछ दिनों के लिए दिल्ली से बाहर गया था, इसलिए आपको शीघ्र न लिख सका ।
मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि आपने चेक उपन्यास का अनुवाद ‘बाहर और परे’ पढ़ रखा है । मैंने एक अन्य उपन्यास (जो मेरा बहुत ही प्रिय उपन्यास है) ‘एमेके : एक गाथा‘ का अनुवाद किया था जिसे सम्भावना प्रकाशन, रेवती कुञ्ज, हापुड़ ( उ.प्र.) ने प्रकाशित किया है। आप उसे भी अवश्य पढ़ें। बहुत पसंद आएगा ।
बुरा न मानें तो एक बात कहूँ? आप बहुत ज्यादा ‘शब्दों’ से संत्रस्त जान पड़ते हैं । एक संवेदनशील लेखक शब्दों का आदर अवश्य करता है, उनसे भयभीत नहीं होता । शब्दों का मर्म जीने के सत्य में निहित है – जिस क्षण आप इस सत्य को व्यक्त करने के लिए आतुर हो जायेंगे, शब्द स्वयं आपकी मदद करेंगे कि आप उन्हें खोज पायें । हमें शब्द और सत्य को अलग अलग करके नहीं देखना चाहिये । एक युवा लेखक होने के नाते आपको सबसे पहले अपने अनुभवों की छानबीन करनी होगी, फिर कहानी लिखते समय आपके अनुभव स्वयं अपनी भाषा गढ़ लेंगे ।
मेरा उपन्यास समाप्त हो गया है। ‘सारिका’ में ही उसका एक अंश निकला था ।
आजकल क्या पढ़ लिख रहे हैं ?
आपका
निर्मल वर्मा
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नयी दिल्ली – 5
21.08.1983
प्रिय योगेन्द्र जी
आपको मेरा ऊपर का पता देखकर कुछ आश्चर्य होगा । मैं एक डेढ़ महीना पहले त्यागपत्र देकर दिल्ली लौट आया हूँ । सुबह का भूला – लेकिन शाम को अपनी जगह ।
यह भी शाम है और बाहर हल्की बूंदाबादी हो रही है । अपने सब स्थगित काम अब बटोरने में लगा हूँ – जिसमें आपको पत्र लिखना सबसे अव्वल चीज़ मालूम देती है । मैं बहुत दिनों से आपको पत्र लिखना चाहता था, लेकिन भोपाल से लौटने के बाद अप्रत्याशित जिम्मेदारियां एक साथ टूट पडीं । मुझे एक पेपर पढने इलाहाबाद जाना पड़ा, वात्स्यायन जी के वत्सल निधि की ओर से एक व्याख्यानमाला रायकृष्ण दास की स्मृति में आयोजित है – इसी में ‘भारतीय परंपरा और समकालीन जीवन’ पर एक निबंध पढ़ा था जो इस बार पूर्वग्रह में आ रहा है । आपकी प्रतिक्रिया जानना चाहूँगा ।
किन्तु इस काम में मेहनत थी तो थोडा बहुत संतोष भी था, इससे अधिक चिंता हमारे भाई के स्वास्थ्य को लेकर आ खडी हुई जो हमारे साथ ही इस मकान में रहते हैं । वह बरसों से अकेले रहते आये थे किन्तु शायद यह अकेलापन चुपचाप इतनी बुरी तरह इकठ्ठा होता गया जिसका मुझे अनुमान नहीं था । भोपाल से लौटा तो पाया कि वह मानसिक रूप से बहुत ही depressed रहते हैं । एक डेढ़ महीना बराबर उनके साथ समय बिताना पड़ा … ये बहुत ही मुश्किल दिन थे लेकिन किसी तरह बीत गए । हिन्दू परिवारों में वैसे तो लोग बहुत निकट रहते हैं – जो बड़ा सहारा है – किन्तु जब किसी कारण से यह सहारा हट जाता है – तो एक व्यक्ति का अकेलापन पश्चिम के मनुष्य के अकेलेपन से भी कहीं ज्यादा बोझिल और असह्य हो जाता है – क्यों कि संस्कार से वह उसका अभ्यस्त नहीं है – वह उसे जीता नहीं, झेलता है । मैंने इन दिनों जो कुछ सीखा वह बहुत सी किताबों में पढ़ा था, नंगी आँखों से देखा नहीं था ।
खैर, मैं आपके बारे में पूछना चाहता था और अपना पचड़ा ले बैठा । दिल्ली में जो मुलाकात हुई, कभी कभी वह बहुत याद आती है, रामू गाँधी से आप मिले और वह हमारे साथ थे, यह सोच कर भी बहुत ख़ुशी होती है । अच्छे क्षण कितने अनायास जिंदगी में आते हैं – unplanned – बिना किसी संकल्प या तैयारी के – और वे ही सबसे ज्यादा छाप छोड़ जाते हैं ।
आप इन दिनों क्या करते रहे ? विवाह की कोई तिथि निश्चित हुई ? यदि निकट भविष्य में दिल्ली आना हो तो अवश्य सूचित करें, मिलकर बहुत ख़ुशी होगी ।
आजकल क्या पढ़ रहे हैं ? क्या इन दिनों कोई निबंध या कहानी लिखी ?
मैंने एक लम्बी कहानी धर्मयुग को भेजी थी, लेकिन वहां हड़ताल चल रही है – शायद कहानी की नियति यही है कि वह बंद ताले के पीछे पड़ी रहे ।
आप ठीक होंगे, इस आशा में –
आपका
निर्मल
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नयी दिल्ली – 5
10.05.1989
प्रिय योगेन्द्र जी
इतने लम्बे अरसे बाद आपका पत्र देखकर मन आश्वस्त और उत्साहित हो गया – आश्वस्त इसलिए कि इतने लंबे अंतराल में आपकी ओर से कोई खबर न मिलने के कारण मैं कभी कभी आपके बारे में चिंतित हो उठता था । आप सपरिवार सकुशल हैं, यह जानकर ही मन को तसल्ली मिल जाती है ।
इन दिनों मेरा जीवन अनेक ‘परेशानियों’ के बोझ तले दबा रहा – परेशानियाँ मेरी अपनी ही चुनी हुई थीं जिसके लिए मैं किसी अन्य को दोष नहीं दे सकता। जर्मनी में एक पेपर अगले महीने पढ़ना है जो अब तक अधूरा पड़ा है । उसे जल्दी भेजना है इसलिए चिंता बढ़ती जाती है । इसके साथ ही कुछ दूसरे काम भी हैं जो बाहर जाने से पहले निपटाना ज़रूरी हैं – समय धीरे धीरे संकरा होता जाता है और हाथ पैर फैलाने की सुविधा कम से कमतर । मुझे गर्मी की छुट्टियों के दिन याद आते हैं जब मैं स्कूल में था । तब का ढेरों गंवाया हुआ समय आज भी ईर्ष्या से भर देता है – क्या मैं उसमें एक गहरी डुबकी लगा कर अपनी चिंताओं को नहीं धो सकता ?
आपने ‘सूखा’ और ‘कव्वे और काला पानी’ के बारे में जो बातें लिखीं, वे बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी जान पड़ीं । आपके पत्र को पढ़कर अचानक बोध हुआ कि इतने अरसे में आपकी लेखनी, चिंतन और भाषा सामर्थ्य कितनी प्रखर और संपन्न और प्रौढ़ हो चुकी है। आप चिंतनपूर्ण शैली में पहले भी पत्र लिखते थे किन्तु अब आपके लेखन में एक पैनी और चमकदार विवेचन शक्ति आ गयी है, जिसमें पहले का कुहासा और धुंधलापन नहीं है ।
आपने कुछ शोक-भाव से लिखा है कि पिछले वर्षों में आपने कुछ अधिक लेखन कार्य नहीं किया है – किन्तु आपके पत्र को पढ़कर मुझे यह ‘पश्चाताप’ निराधार जान पड़ता है। आखिर हम जो कुछ अनुभव करते हैं, सुनते हैं, सोच कर गुनते हैं, अपने को हर निर्णय के तराजू पर तौलते हैं, असफल होते हैं बार-बार और कभी कभी सुख भी महसूस करते हैं कि हम जीवित हैं और दफ्तर से लौटकर अपनी बच्ची को प्यार कर सकते हैं, अधूरा पढ़ा हुआ उपन्यास फिर से पढ़ना शुरू कर सकते हैं – इन सब रेशों से अगर हमारे जीवन का ताना-बाना पूरा नहीं होता और हमें लगता है कि कोई कमी है जो सिर्फ लिखने से पूरी हो सकती है, तो फिर लिखना अपने में एक सहज प्रक्रिया हो जाती है । आपने काम्यू की जिस कहानी का जिक्र किया है उसे मैंने भी बहुत अरसा पहले पढ़ा था। मुझे लगता है वह कहानी बहुत गहरे से सृजन और जीवन के अद्भुत और पीड़ित सम्बन्ध को उद्घाटित करती है – न paint कर पाना कभी कभी तलाश की रहस्यपूर्ण यात्रा को ज्यादा सच्चाई से अभिव्यक्त कर सकता है – उन चित्रों की तुलना में जो हमेशा किसी सत्य को अभिव्यक्त करने का दावा करते हैं – इससे न ‘लिखने’ का कोई बहाना नहीं मिलता सिर्फ उस विवशता का मतलब समझ में आता है जिससे लिखना कोई अर्थ ग्रहण कर पाता है । देखिये, आपके पत्र को पढ़कर मैं इतना उद्वेलित हो गया कि पूरा एक स्टेटमेंट लिख दिया ।
मैं कुछ दिनों के लिये शिमला जा रहा हूँ । मई के अंत तक लौटूंगा । मुझे भी बहुत दुख है कि इन वर्षों के दौरान कुछ ऐसे संयोग रहे कि आपसे मुलाकात नहीं हो सकी ।
सस्नेह
निर्मल
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नयी दिल्ली
26.12.1990
प्रिय योगेंद्र जी,
आपका पत्र मिला। मैं बहुत दिनों से आपको लिखना चाह रहा था, किन्तु इस बीच आवश्यक कारणों से बाहर जाना पड़ा। यात्राएँ मुझे आकर्षक लगती हैं, किन्तु उनसे दैनिक जीवन की लय में जो अस्थिरता आती है, वह उन कामों को स्थगित कर देती है जो केवल अपने कमरे की शांति में ही संभव लगते हैं। अपने मित्रों को पत्र लिखना इन्हीं कामों में से है।
आपके पत्र ने मुझे गहरी व्यथा और सोच में डाल दिया। आपको जिस तरह का जीवन जीना पड़ रहा है उसमें स्वाभाविक है कि अधिक लिखना-पढ़ना संभव नहीं हो पाता। थकान की हताशा बहुत गहरी होती है, किन्तु क्या उससे इतना निराश हो जाना चाहिए कि आसपास के अनुभव अर्थहीन जानने पड़ें? जिन चीजों पर अपना वश नहीं होता उनके लिए अपने को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। मैं नहीं सोचता आपने अपनी ‘युवावस्था का समय’ व्यर्थ गँवाया है, जैसा आप लिखते हैं। आपने अपने कठिन संघर्षपूर्ण जीवन के बावजूद जो अध्ययन-मनन किया है, वह कम मूल्यवान नहीं है। आप कितनी प्रांजलता से इतने अनुभूतिपूर्ण चिंतनशील पत्र लिखते हैं, उन्हें पढ़कर क्या कोई यह कहेगा कि यह शिथिल या मंद मस्तिष्क की देन हैं? समय की सदुपयोगिकता इससे सिद्ध नहीं होती कि हमने कितनी पुस्तकें प्रकाशित कर लीं, कितनी कहानियाँ कविताएँ लिख डालीं … लंबी संख्या में रचनाएँ उत्पादन करने वाले हिंदी में कम नहीं हैं। क्या आप अपने को उनमें शामिल करके कोई सच्चा आत्मसंतोष प्राप्त कर पाएंगे?
मुझे लगता है कि यदि हम अपने वर्तमान के प्रति सचेत और सक्षम हैं तो वह चाहे कितना ही अंधकारपूर्ण और जानलेवा क्यों न हो, कभी भविष्य में अवश्य फल देता है। चेखव की सबसे मार्मिक कहानियाँ वे हैं जिनके अनुभव उन्होंने उपेक्षित गवई गाँवों में डॉक्टरी करते, अकाल पीड़ित लोगों की सेवा करते या सखालिन द्वीप की दुर्गम यात्रा करते हुए भोगे थे, आँखों से देखे थे। आपने स्वयं अपने पत्र में अपने कस्बाती जीवन की जो अंतरंग मार्मिक अंतरदृष्टिपूर्ण झाँकी दी है वह असंभव होती यदि आप शहरी बुद्धिजीवियों की तरह अपना समय कॉफी हाउस में किताबों की बातें करते हुए बिताते, और जिसे आप ‘समय गँवाना’ कहते हैं, वे आप जैसे भावप्रवण व्यक्ति नहीं बल्कि महानगरों के तथाकथित ‘बुद्धिजीवी’ करते हैं, जिनके प्रति गांधी जी, टॉलस्टॉय और प्रेमचंद जैसे व्यक्तियों के मन में गहरी वितृष्णा थी। मैं आपके वर्तमान जीवन की हतोत्साहित करने वाली कठिनाइयों को कम करके नहीं देख रहा, किन्तु यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण बात होगी कि वे आपके आत्मविश्वास को डिगा दें अथवा आपको अपनी सच्चाई के प्रति शंकालु बना दें। आज हिंदी साहित्य का अभिशाप यह है कि बहुत कम लेखक शहरी जीवन की सुविधाओं के मोहपाश से छुटकारा पाने का जोखिम उठा पाते हैं ताकि भीतर और बाहर के उन बीहड़, दुर्गम, अनछुए अनुभवों को उजागर कर सकें जिनमें कला और कृति अपनी गरिमा हासिल करती हैं। प्रेमचंद, रेणु, मुक्तिबोध ऐसे ही लेखक थे। इसीलिए हम व्यर्थ की बहसों में न जीवन का आनंद (जो सुख-सुविधा से बहुत अलग है), न रचना का सत्य खोज पाते हैं।
शायद आपको लगे कि दिल्ली में बैठकर इस तरह के उपदेश देना कितना आसान है, लेकिन किन्तु जो मैं आपको लिख रहा हूँ, वह एक तरह से अपनी ही हताशा को व्यक्त कर रहा हूँ जो मुझे अपने जीवन में महसूस होती है। कुछ दिन पहले मैं भोपाल गया था, भारत भवन पर जो कठिनाई आई है उसका विरोध करने। उसी सिलसिले में शाह जी से भी मुलाकात हुई थी। बहुत देर तक उनसे बातचीत होती रही। वह भी बहुत दुखी और संतप्त जान पड़ते थे, किन्तु बड़ी बात यह लगी, वह समस्त आत्मव्यथाओं और अंतरद्वंद्वों के बीच – और उनके बावजूद – बराबर लिखते रहते हैं। क्या आपने उनका नया उपन्यास ‘पूर्वापर’ पढ़ा जो मुझे बहुत अच्छा लगा? क्या आपको वहाँ पुस्तकें पढ़ने को मिल पाती हैं?
कभी दिल्ली आने का सुयोग लगे तो अवश्य मिलें, बहुत खुशी होगी।
आप सबको नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।
सस्नेह,
आपका
निर्मल
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दिल्ली 8.10….. (वर्ष अस्पष्ट है)
प्रिय योगेन्द्र जी
यदि पिछले तीन चार दिनों से मैं आपको लिखना टालता रहा तो उसका कारण था कि मैं समझ नहीं पा रहा था कि कहाँ से शुरू करूँ ।
आपकी कहानी ने मुझे एक अजीब विषण्ण सी मनःस्थिति में झोंक दिया ( इससे बेहतर शब्द और नहीं सूझता ) जिसे ‘साफ़ सुथरे’ शब्दों में संप्रेषित कर पाना असंभव था । एक भारतीय उपनगर या कस्बे या छोटे शहर में बसने, जीने वाले लोगों की दम घोटती, कुलबुलाती जिंदगी पर आपकी कहानी अपनी तीखी, क्रूर, मर्मभेदी रौशनी का चकत्ता फेंकते हुए न जाने कितने नाले नालियों, गड्ढों और गलियों को पार करती जाती है । मुद्दत पहले गोर्की का नाटक Lower Depths पढ़ा था; भूल चुका हूँ अब उसके ब्यौरे, सिर्फ एक किस्म के भयावह ‘हॉरर’ की अनुभूति कहीं अंतस्तल में बची रह गयी थी जिसे आपकी कहानी ने खुरच और खोद कर फिर से स्मृति की सतह पर ला दिया । मुझे लगा, बरसों पहले आपने जो कहानियाँ लिखी थीं, उनकी सूक्ष्म अंतर्मुखता उलट कर बाहरी दुनिया के यथार्थ को एक व्यापक मानवीय फलक पर चरितार्थ करती हो । आप ‘बाहर’ आये हैं पर भीतर की कीमत पर नहीं, बल्कि यह कहना ज्यादा सच होगा, कि भीतर की अमूर्त, अवसादपूर्ण अंतर्दृष्टियों को इस कहानी में एक वस्तुपरक कथ्यात्मक (narrative ) ढांचा मिल गया है, जहाँ प्रवेश करके हममें से हर कोई अपना ‘नरक’ अलग अलग गंधों, रूपों समझौतों और तार तार होती विवशताओं में देख सकता है, पा सकता है ।
मुझे इस कहानी का शिल्प अद्भुत जान पडा है, कैसे आपने एक बिना किसी कृत्रिम (*) अथवा लटकों का सहारा लिए इतने लोगों, पात्रों, चरित्रों के साथ होने वाली वार्ताओं को साधा है । आप कहीं भी अपनी कलात्मक पकड़ को ढीला नहीं पड़ने देते । आपकी कहानी एक सीधी लाइन में न चलकर एक समय में ही अनेक दिशाओं में अग्रसर होती है या शायद अग्रसर शब्द भी सही नहीं है, वह एक वृत्त से दूसरे वृत्त में चक्कर लगाती है जैसे समूची कथा की रील concentric circles में घूम रही हो जिसमें हर पात्र का एक पहलू दिखाई दे जाता है फिर वह अधबीच रास्तों में गुम हो जाता है और फिर कहीं अगले मोड़ पर दिखाई देता है । इससे कुछ दुरूह किस्म की अस्पष्टता ज़रूर उत्पन्न होती है कभी-कभी पात्रों के अंतर्संबंध धुंधले से रह जाते हैं किन्तु अजब बात यह है, कि घटनाएँ अपने होने में (सर्वेश्वर की मृत्यु भी जो मेलोड्रामेटिक हो सकती थी), एक नियतिपूर्ण, घातक (fatalistic) अनिवार्यता लिए होती है, जिसमें हर भयावह से भयावह घटना विश्वसनीय जान पड़ती है – विश्वसनीय और इसलिए – असहनीय ।
आपकी इस कहानी को पढ़कर मैं देर तक एक अजीब स्थिति में पड़ा रहा, वह न तो अवसाद था न depression ( हालाँकि दोनों का घना भाव रह जाता है ), बल्कि एक किस्म का सुन्न सा हो जाने की स्थिति जब सब कुछ पीला, पथराया सा जान पड़ता है । ऐसा मेरे साथ बहुत कम हुआ है हिंदी कहानियाँ पढ़ते हुए … मेरे लिए यह एक निपट अनूठा अनुभव था । यह उस कहानी से बहुत अलग है जो कुछ महीने पहले मैंने ‘पहल’ में पढ़ी थी, जो मुझे अधिक अच्छी नहीं लगी थी ।
आप उस दिन दिन हरि जी के साथ आये, मुझे बहुत अच्छा लगा । दुर्भाग्यवश अधिक समय बैठना नहीं हो सका । इतने मुद्दत बाद आपसे मिलना हुआ … आशा है आप भविष्य में इतनी ही सशक्त कहानियाँ लिखते रहेंगे ।
शुभकामनाओं सहित
सस्नेह
आपका
निर्मल
(*) यह शब्द अस्पष्ट है ।
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