घुसपैठिया

Oriya Story

कन्हेइलाल दास

27 जुलाई पुण्यतिथि पर इनकी एक कहानी का आयशा आरफ़ीन द्वारा किया उड़िया से अनुवाद

रात हो या दिन हो आँखें बंद करते ही, मुझे अजीब-ओ-ग़रीब ख़्वाब घेर लेते हैं। मैं देखता हूँ कि नदी में डूब रहा हूँ, कुएँ में फिसल रहा हूँ या आग से जल रहा हूँ मगर किसी सूरत मर नहीं रहा हूँ। हर बार ख़्वाब में देखता हूँ जैसे कोई मुसलसल मेरे पास-पास है, मुझसे बहुत सारी बातें पूछ रहा है, परेशान कर रहा है। कभी मुझे मुसीबत से बचाता है तो कभी मुसीबत की ओर ढकेल देता है। 

मैं जानता हूँ…मैं जानता हूँ वो धरती का कोई इंसान नहीं हालाँकि वो इंसानी शक्ल से बहुत मेल खाता है। वो कोई बिना शरीर वाला भूत, प्रेत या कोई नरास्व भी नहीं है। मैंने कई दफ़ा उसे देखा है, कई बार उससे सामना हुआ है। ज़िंदगी के अक्सर पल मैंने उसे पहचानने में गँवाएँ हैं। अचानक कल रात वो गिरफ़्त में आ गया। मेरे कमरे में अँधेरा था। मैं घर में अकेला था। तभी बाहर से क़दमों की आहट सुनाई दी। मैंने कान खड़े कर लिए, इंतेज़ार करता रहा। मुझे ठीक से याद है मेरा दरवाजा अंदर से बंद था मगर फिर भी वो अंदर दाख़िल हो गया। मैंने डर के मारे स्विच की तरफ़ हाथ बढ़ाया। 

कन्हेइ।

कौन?

रहने दो, रौशनी मत करो।

क्यूँ?

मुझे रौशनी से डर लगता है।

मगर तुम हो कौन?

मैं…तुम मुझे जानते हो।

नहीं, मुझे तो याद नहीं आ रहा। तुम्हारी आवाज़ भी तो जानी-पहचानी नहीं लगती।

हो सकता है भूल गए हो। 

नहीं। मैं कुछ नहीं भूलता। सब याद रखता हूँ।

मगर तुम्हें वो बात याद है न…

कौन सी बात?

उस दिन दोस्तों के साथ देसी चीज़, जलती ढिबरी के चारों तरफ़….

मगर…मगर तुमने तो माँ के सामने क़सम खाई थी…

हाँ।

फिर भी?

नहीं, वो तो दोस्तों ने ज़िद की थी इसलिए।

वाह! शाबाश! और एक बात याद है तुम्हें?

अब कौन सी बात?

उस दिन रात में….

नहीं, मुझे तो याद नहीं आ रहा।

अरे हाइवे पुल के पास।

नहीं मैं कुछ नहीं जानता।

मगर मैं जो जानता हूँ…

क्या?

झिमनी को दस रुपये किस लिए दिये थे?

उ… उस…उसको ज़रूरत थी, इसलिए।

उसकी ज़रूरत या तुम्हारी ज़रूरत?

उस्स… उसकी।

नहीं, तुम्हें ज़्यादा ज़रूरत थी— एक औरत के जिस्म की।

चुप। बिलकुल चुप।

हुंह। ग़ुस्सा करने से कोई फ़ायदा नहीं। अच्छा, एक और बात पूछूँगा।

क्या?

तुम तो सिद्धांतों को समझते हो?

हाँ।

चोरी करना पाप नहीं है?

हाँ है।

तुमने तो कभी चोरी नहीं की?

नहीं। मैंने कभी चोरी नहीं की। 

अच्छा! उस दिन तुम्हें ज़रूरत थी तो दोस्त की सोने की अँगूठी लेकर फ़रार हो गए!

उफ़्फ़! मैं तुम्हारी कोई भी बात नहीं सुनना चाहता। 

मगर मैं तो सारी बातें सुनाये बग़ैर यहाँ से जाऊँगा नहीं।

और अगर मैं ना सुनूँ तो?

तुम प्रीति को जानते हो?

हाँ, पहचानता हूँ, तो क्या हो गया इससे?

रोज़ी को?

हाँ।

तुम प्यार करते हो?

हाँ। मगर तुम ये सब क्यूँ पूछ रहे हो?

किससे?

रोज़ी से।

और प्रीति?

उसको मैं सिर्फ़ जानता हूँ। 

मगर वो तो तुमसे प्यार करती है।

हाँ, मगर मैं उससे प्यार नहीं करता।

झूठ।

नहीं। यही सच है। 

फिर उस दिन तुमने उसे बार-बार ये क्यूँ कहा था कि तुम उससे प्यार करते हो?

मैं…मैं कुछ नहीं जानता। 

अच्छा, तुम उसके जिस्मानी ताप को अच्छे से जानते हो। 

कमाल है, इतना सब कुछ कहने वाले तुम होते कौन हो?

कहा ना… मैं…तुम्हें ग़ुस्सा आ रहा है?

हाँ।

अच्छा। एक और बात पूछूँगा।

नहीं। मैं मज़ीद कुछ और सुनने को तैयार नहीं हूँ। 

ये मेरी आख़िरी बात है।

क्या?

देवी कौन है?

वो मेरी बहन है।

मौसी की लड़की!

हाँ।

शादी शुदा?

हाँ। शादी शुदा।

तुम उसके शौहर के मरने की दुआ करते हो।

बिलकुल बकवास बात।

मगर है तो अँधकार की तरह सत्य।

चुप, इडियट, चुप। मैं अभी के अभी तेरा क़त्ल कर दूँगा। 

परछाई ने पीछे हटते हुए बहुत ज़ोर का ठहाका लगाया। मुझसे ये बर्दाश्त न हुआ। मैंने बिस्तर से एक किताब उठाई और उसकी तरफ़ फेंकी। इसके बावजूद भी उसकी हँसी पूरे घर में गूँज रही थी। 

मैं उसकी तरफ़ लपका मगर कामयाब न हो सका। वो उस वक़्त आराम से कुर्सी पर बैठा हँस रहा था। मैं कुर्सी के पीछे गया और मैंने उसके सर पर एक मुक्का मारा। मगर उसको कुछ न हुआ। अलबत्ता मेरा हाथ कुर्सी से ज़ोर से टकराया। टकराने की वजह से मेरे हाथ से ख़ून निकलने लगा। 

फिर उसको खिड़की के पास देखा। उसका पीछा किया कि अबकी बार पकड़ लूँगा। मगर मैं उसे पकड़ न सका। आख़िरकार तकिये के नीचे से रिवॉल्वर निकाली, उसकी पेशानी को निशाना बनाकर छ्ह राउंड गोलियां चला दीं। फिर भी वो भावहीन हो कर हँस रहा था। मैंने जल्दी जा कर स्विच ऑन कर दिया। 

दफ़्फ़तन उसने मुँह फेर लिया। एक पल के लिए मैं उसके चेहरे को देखकर हैरान रह गया। 

अरे, इसको तो पहले कहीं देखा है। एक बार नहीं बल्कि कई बार। 

मैं उसको पकड़ सकूँ इससे पहले ही वो दरवाज़े से बाहर निकल गया। 

उसका पीछा करते हुए मैंने देखा, वो फाटक पार करते ही बहुत जल्द अँधेरी खाई में कहीं गुम हो गया। 

मैंने अपने सोने वाले कमरे के अंदर आ कर देखा, मेरे कमरे में काँच के टुकड़े बिखरे हुए हैं और हर तरफ़ बर्बादी के निशान मौजूद हैं। छह राउंड गोलियां दीवार पर टंगी मेरी तस्वीर के माथे पर ही लगी थीं। मैं दीवार से टूटी तस्वीर उतार कर नीचे लाया तो चौंक पड़ा क्योंकि रात के घुसपैठिये के साथ तस्वीर काफ़ी हद तक मेल खाती थी।   

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कन्हेइलाल दास
जन्म 27 जून, 1947, कोलकाता। स्कूली पढ़ाई बारिपदा (ओडिशा) में हुई. पश्चिम बंगाल में नौकरी की। उन्होंने अपने जीवनकाल में 100 से अधिक कहानियां और दो उपन्यास लिखे। महज़ 28 साल की उम्र में, 27 जुलाई, 1975 को भुवनेश्वर में उनका देहांत हुआ।

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Ayesha Arfeen
ayesha.nida.arq@gmail.com

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