स्मृतियों का रचनात्मक स्वरूप

महेश दर्पण

Mahesh Darpan

‘रवि कथा’ के बावजूद ‘शेषकथा’ क्यों? इसका उत्तर है — कहानी कहीं लिखने वाले के लिए कभी खत्म होती है क्या? ‘रवि कथा’ में भी जाने कितनी शेष कथाएँ रह गयीं। कथा की वाचक को ‘जो नहीं कहा’ ने बेचैन किया। इसी वजह से वह दिल्ली की एक उजाड़ बस्ती में होते हुए भी, बहुत पीछे और दूर छूट गए मथुरा-वृंदावन की ओर खींच ले जाती है। जहाँ है इंदुमती की दुखभरी दास्तान में पति के सम्मुख रोना। रोने का कारण है घर की स्थितियाँ और माहौल। पति की नौकरी लगने के साथ उसके अर्थात वाचक की माँ के दिन बदलने की उम्मीद ज़रूर थी, पर बाबा के कड़े रुख ने पिता को जड़-वत कर दिया।

‘रिक्रिएशन ऑफ मैमोरीज़’ की इस प्रक्रिया में ममता कालिया की भाषा ठेठ ज़िंदगी की बोलचाल से से निकली है। यहाँ उसी में ढले शब्दों की आवाजाही है और है जीवन-सी प्रवाहमय अभिव्यक्ति भरा कहन। यह बताता है कि पारिवारिक जेल से मुक्ति का मार्ग बनाया, दिल्ली के कॉमर्स कॉलेज में मिली लेक्चररशिप ने। पति के साथ दिल्ली आकर माँ को मिली आज़ादी। पर यहाँ आकर भी पढ़ने-पढ़ाने में खोये पिता ने माँ के कष्ट न देखे। ऐसे में वाचक ‘ममता’ के बालपन में हुई चेचक को माँ के प्रयत्नों ने ही ठीक किया।

माँ के पास हैं अनेक दुःखमय स्मृतियाँ। इनमें बहन लब्बावती का एबटाबाद की बर्फ़ में दफ़न हो जाना भी है। एक मॉसी ऐसे गई और मॉसी बिरजो को ले गया ज़हरबाद। अब बच रह गई बस एक मॉसी। मायके से माँ का रिश्ता टूट-बिखर जाना यूँ ही नहीं हुआ। इसमें मामियों की भूमिका कारगर रही। होने को माँ के चार-चार भाई, पर हद दर्जे के निष्ठुर। पीछे, बहुत पीछे की इस स्मृति कथा में माँ की बहन प्रेमलता सबसे छोटी है ज़रूर, पर दोनों के मध्य संवादहीनता।

एक रौ में बहती जा रही इस स्मृति कथा के छोटे-छोटे अध्याय पाठक को पकड़े रहते हैं। इस कथा का विकास कहीं कथा की स्मृतियों से बने रेशों से होता है तो कहीं चरित्रों से, जो परिवार के भीतर भी हैं और बाहर भी। कहना ज़रूरी है कि यह सब ‘रविकथा’ में नदारद रहा है।

यदि पारिवारिक चरित्रों की बात की जाये, तो सबसे पहले मॉसी प्रेमलता ही आती हैं। वह अदेखे की शिकार हैं। पढ़ाई में पिछड़, स्कूल से बाहर हुई इस उपेक्षिता को मामाओं की व्यस्तता और मामियों के ताने व जीवन की ठोकरें ही मिलीं। पर इससे उसमें उग आई ऐसी दृढ़ता कि वह जब्त करने के गुर में प्रवीण हो गयी। उसने घर पर रह विद्याविनोदिनी पास की और किए घरेलू काम-काज। अठारह की उम्र में हुए विवाह ने उसके जीवन में परिवर्तन किया। अपनी इस मॉसी को ममता पूरे मन से स्मरण करती हैं। मॉसी के घर का वातावरण सरस है। वह माँ के घर जैसा अग्रवाल साहब का घर नहीं। ममता बताती हैं कि रिश्ते कैसे और क्यों बिखरते चले गए।

वाचक की स्मृति गज़ब की है। उसमें घर-परिवार का सब कुछ बंधा चला आया है। जैसे सबसे बड़े मामा कालीचरण की हिसाब में चुस्ती। उनकी पत्नी शांता में बड़ी बहू की ठसक। उनके बच्चों के बीच वाचक का सामान्य ज्ञान में पिछड़ जाना। मामा द्वारा बच्चों के बीच खेरीज़ बांटना ही नहीं उनका पहनावा और बर्ताव भी। लाल मामा अर्थात लालचरण को इस स्मृति कथा में सुंदर, व्यापार और नफ़ासत पसंद, स्मार्ट और चौकस बताया गया है। लड़की देखने से बाद तक का उनका शादी का प्रसंग, उनसे उन्नीस पत्नी का नब कर रहने का आश्वासन, बड़े भाई की सीख तो यहाँ दर्ज़ है ही, पर दमयंती के पत्नी बनकर आने पर पति का उसे अपने साथ धोखा बताना भी है। खुद दमयंती इस तथ्य से अनजान है कि शादी से पूर्व उसकी जगह तस्वीर बहन की दिखा दी गई थी। यहाँ शांता की भूमिका महत्त्वपूर्ण, वह दमयंती को प्यार से संभालते हुए व्यवहार कुशलता का परिचय देती है। स्कूल में पढ़ाने लगी दमयंती को देख पति का भी हृदय परिवर्तन कथा को मानवीय बनाता है।

तीसरे मामा अजुध्याप्रसाद की पत्नी का नाम भी शांता। अब घर में इस नाम की दो बहुएँ। ऐसे में जब नई बहू के समक्ष नाम परिवर्तन का प्रस्ताव आया तो उसने निरस्त कर दिया। यह नई बहू यह देख हैरान रह गई कि परिवार में स्त्रियाँ सिरे से अधिकारच्युत हैं। गुसलखाना तक न होना उसे अखर जाता है। इस तर्कशीला को परिवार मुँहफट समझ रहा है। इसी तुफैल में यह शांता अंततः दूसरे शहर में कार्यरत पति के पास पहुँच जाती है। वह भी खुश और पति भी।

Shesh Kathaपरिवार में वाचक की एक हैं प्रतिभा दीदी। इस रूप और गुणगर्विता का नरेंद्र अग्रवाल के प्रेम में पड़ जाना अतीत की एक दृश्य कथा की तरह आया है। ओपी के घर का यह समूचा प्रकरण जीवंत और सरस है। माँ-पिता को इस रिश्ते से असहमति व विरोध है, पर प्रतिभा के बगावती तेवर की विजय सुखांत प्रस्तुत कर शादी तक जा पहुँचते हैं। इस अनुभव को देख वाचक ममता की तीन कसमें गौरतलब हैं।

चरित्रों के क्रम में पारिवारिक तस्वीर खुल-खुल जाती है। इसकी शुरुआत बालपन से ही हो जाती है। वाचक के मन में सहज तुलना चलती है यह कि कैसा था वह सहज-सरल बचपन और कैसा है आज का! वस्तुतः उसका संकेत संयुक्त परिवारों और एकल परिवारों के बचपन की तुलना की ओर है। यहाँ वह अपने बालपन के घर को आत्मीयता से स्मरण करती है। पिता के तबादलों के साथ-साथ अपनी घुमंतू स्थिति में बच्चों के संघर्ष और बदले परिवेश में भी मज़ा लेते बच्चों की कथा अलग ही रस लिए है। कभी नागपुर तो कभी इंदौर आकाशवाणी में उपकेंद्र निदेशक पिता अपनी सेवा शर्तों से बंधे हैं।

वाचक ममता को दिल्ली आकर हिंदू कॉलेज में दाखिला तो मिला पर खला यह कि ऐसा दूसरे की सिफ़ारिश पर क्यों? बहरहाल, अंग्रेजी विभाग में रमा मन। यहाँ प्रो. तंवर की स्मृति में उनका पढ़ाने का ढंग और बी. राजन का मौलिकता के सम्मान का पाठ रुचा। कथा अब दौलतराम कॉलेज में ऑनर्स सिलेबस पढ़ाने तक खिंची चली आई है।

ममता को घर में अपनी भूमिका, बेटे-सी स्मरण है तो अन्विता से याराना भी। पापा-मम्मी से इस मुन्नी के रिश्ते के धागे ही नहीं, मायके में गुज़रे चौबीस बरस खुलते जाते हैं संकेतों में। एक लेखक के इस आत्माख्यान में परकथा भी शामिल है और साहित्यिक जीवन भी। यहाँ कथा ज़ाहिर करती है कि ममता जी का लेखन 1961 के आसपास प्रकाशित होना प्रारंभ हो गया था। प्रारंभ में कविताएँ। असंतोष और गुस्से से भरी। मोहभंग प्रधान। अकविता का रंग। वाचक को असल जीवन से अधिक जीवंत लगा किताबों का जीवन। कुछ कहानियाँ भी छपीं तो विधांतर हुआ। वाचक में निर्मल वर्मा के साहित्य की दीवानगी तो दिखती ही है, अज्ञेय की अध्यक्षता में कविता-पाठ करती भी वह नज़र आती हैं। भारत चाचा इसमें माध्यम बनते हैं। कहानी ‘ऊंचे-ऊंचे अंगूर’ पुरस्कृत हुई पर अब मिलती ही नहीं। वाचक की आज़ादख़्याली का आलम यह है कि सिविल सर्विस परीक्षा इसलिए नहीं देनी कि वहाँ चयनित अभ्यर्थिनी पर विवाह न करने की शर्त लदी है। स्वयं को सुंदर मानने वाली वाचक को अपनी हस्ती का सम्मान करने वाला लड़का ही पसंद, लड़कीपना दोयम है यहाँ। वाचक को डिक्टेशन कतई पसंद नहीं किसी का। राजेंद्र यादव का भी नहीं। दास्तान यहाँ बता रही है कि ‘कहानी सवेरा’ से लौटते वक्त रवीन्द्र कालिया का जो साथ मिला, वह फिर हमेशा के लिए हो गया।

इस नए रिश्ते ने जहाँ प्रेम को एक स्थायी रूप दिया, वहीं नए परिवार के नए अनुभव भी। वाचक ने इसे एक मुहावरे में कहा — मन-मस्तिष्क का नया क ख ग पढ़ना। जहाँ ममता के पापा-मम्मी इस रिश्ते से खुश न थे, वहीं वह सोच रही थी कि लड़की हमेशा कोष्ठक में क्यों रहे? कालिया (रवीन्द्र) की निर्भीकता का आलम तो यह था कि वह सिविल मैरिज तक के लिए तैयार था। ममता में बेशक इसे लेकर एक झिझक रही। उसे तो अपने समझे पक्के विवाह में यकीन था।

कथा की खूबसूरती यह है कि वाचक सब कुछ खुलकर सम्मुख करने को तत्पर है। वह ससुराल में नई बहू की झिझक, सास का सामना और अपने नंबर कट जाना स्वीकार करती है। एक ओर यह आलम है और दूसरी ओर है रवि की मस्ती। एक जगह न टिकना और सरकारी नौकरी छोड़ ‘धर्मयुग’ में जा पहुँचना ही नहीं, मायके में रवि के गुणों की चर्चा कथा में अलग रंगत लाती है।

वाचक के पास अपने परिवार की स्मृतियों की एक अलग दुनिया है। इसमें भारत चाचा के यहाँ रहने के अनुभव अलग ही हैं। दौलतराम में नौकरी है और है पापा व रवि की सोच में अंतर। विवाह पूर्व की स्मृतियाँ हैं और विवाह की तैयारियों का समय। यह 150 रुपये तोला सोने का समय है जिसमें 500 रुपये में पूरे गहने खरीद लिए गए। सामान्य ढंग से हुए इस विवाह में रवींद्र के असामान्य दूल्हे के रूप में रोचक प्रसंग हैं। विवाह स्थल पर उनके दोस्तों का जमावड़ा है और वधू को सजाने की फ़िक्र घर पर किसी को नहीं। और तो और, रिश्तेदार ममता की ‘प्यार शब्द घिसते-घिसते…’ कविता दिखाते घूम रहे हैं।

यहाँ मायके वालों की हिन्दी ससुराल वालों को रास नहीं आ रही। भाषा भी नाराज़गी और बेइज़्ज़ती का सबब बन रही है। बहरहाल कुछ दोस्तों की साक्षी में फेरे और पारंपरिक शादी में निजता के चिथड़े उड़ रहे हैं। याद रह गया है तो बस एक शब्द ‘स्वाहा’।

एक दुनिया से दूसरी दुनिया में आकर ममता का सामना होता है सुर्ख रंगों के उत्सव से। सजने-संवरने से। दिल से चाईजी के स्वीकार से। शादी की ड्रामेबाजी पर रवि के तंज से। सूक्ष्म स्मृतियों के साथ कुछ स्थूल भी चली आई हैं। जैसे वधू के साथ आया पुराना ट्रंक। ममता का संकोच मायके में भी रहा और ससुराल में भी बरकरार है। ऐसे में पहली रात का सुबह तक रतजगा और रवि का सिगरेट व ममता का धुआँ पीना सामने आता है।

ससुराल में है सास का रुतबा, उनके नियम-कानून, सिखाने-समझाने के ढंग। चाईजी अर्थात् सास से संवाद की समस्या है और ममता की गफ़लत का आलम यह है कि वह सफ़ाईकर्मी के पैर भी छू ले रही है। हँसी का पात्र बन रही है। पर संतोष है तो रवि द्वारा इसे सहजता से लिए जाने का। दरअसल, यह है दो संस्कृतियों का संघर्ष जहाँ भाषा खाई को और चौड़ा किए जा रही है। खान-पान, रहन-सहन, बोली-बानी के जुदा होने का संघर्ष। यही है जिसने नई बहू ममता को सास की दृष्टि में नापास कर दिया है। परिणामतः उसे हर रोज़ मिलती हैं नई संज्ञाएँ। वह भी ठेठ पंजाबी में।

वाचक ने मायके और ससुराल का तुलनात्मक अध्ययन अपने अंदाज़ में किया है। जहाँ मायके में लड़की की प्रतिभा को चूल्हे में चौपट न करने पर ज़ोर रहा था, वहीं ससुराल उसे रसोई में झोंक रहा था। अच्छी बात यह है कि ममता यहाँ अपनी सरलताओं और मूर्खताओं को भी बाकायदा एक्सपोज़ करती हैं। बताती हैं कि कैसे मायके का पारिवारिक संस्कार और सलीका अवचेतन का हिस्सा बन जाता है। घर का खर्च रजिस्टर पर लिखना इसी का प्रतीक है। पति के इस पर एतराज़ पर दोनों का अंतर खुलता है। एक अनुशासनबद्ध है और दूसरा उससे एकदम बाहर। पाबंदियाँ रवि को बर्दाश्तबाहर हैं। वे बस तभी तक बनी रहती हैं जब माँ-बाप सामने हों। शादी के ढकोसलों-दिखावों से परेशान रवि रिसेप्शन में दावत का मज़ा तक न लेने दें। रवि की विकसित वैज्ञानिक सोच ऐसी है कि उसमें आस्था और विश्वास के लिए जगह नहीं। ऐसे में यह कथा स्त्री के दोहरे संघर्ष को प्रस्तुत करती है। सबसे ऊपर है रवि द्वारा ममता की खबर रखना और खबर लेना। बस उन्हें चिढ़ रहती ताले-चाभी, घड़ी और टाइमटेबल से। उन्हें ममता के अग्रवालपने से चोट पहुँचती है। जालंधर का घर इसके ठीक विपरीत है। संघर्ष के अनेक रूप हैं घर पर। रवि की कल्पना एक कलात्मक घर की है जबकि ममता का संघर्ष बच्चों के साथ है।

ममता की हर स्मृति के छोटे से छोटे छींटें के साथ एक दास्तान खिंची चली आती है। जैसे कच्चे कॉलेज की पक्की नौकरी का प्रसंग। रेल यात्रा में पुलिस वालों का खौफ़, बेवज़ह, मध्यवर्गीय संघर्ष के बीच गोष्ठियों में आमंत्रण। बंबई से खरीदी शराब का इलाहाबाद पहुँचने तक बेकार हो जाना और रवि का यह कसम खाना कि अब सफ़र में कभी सुरा नहीं खरीदनी।

कथा जब रवि के संदर्भ में चलती है तो रविमय हो जाती है और जब ममता के संदर्भ में हो, तब वह ममतामय हो जाती है। जैसे रवि का अमेठी चुनाव में प्रेस सलाहकार बनना और उसी में रम जाना। उनका रुतबा ऐसा कि पत्नी तक परेशान हो जाए। संस्मरणकार की विशेषता यह है कि वह संकेतों में बड़ी से बड़ी बात कह जाती हैं। जहाँ स्पष्ट कहना हो, वहाँ भी वह चूकती नहीं। चुनाव में प्रेस सलाहकार बनना उनकी दृष्टि में एक साहित्यकार के लिए घटिया काम है, तो है। अपने और परिवार के जीवन को मुड़कर देखने की इस प्रक्रिया में वह समय बराबर धड़कता महसूस होता है। यहाँ इंदिरा गांधी की हत्या के बाद का बदला समय है तो कोरोना काल का संस्पर्श भी। सहनशीलता का संकटकाल भी है तो बच्चों से झैं-झैं भी। परिवेश में सांय-सांय है तो जीवन का जोड़-घटा भी कि इतना सब करके भी रवि को कुछ खास हासिल नहीं हुआ।

‘शेषकथा’ का मार्मिक अंश है दिल्ली के घर में रवि के बने होने का अहसास। ऐसे में किसी तरह स्वयं को व्यस्त रखने के सिवा ममता जी के पास कोई विकल्प शेष न था। लेखन, पढ़ना, मोबाइल, बच्चों और स्मृतियों में डूबना-उतराना तब सहारा बने। रवीन्द्र कालिया पर कुछ लिखना तब ममता के लिए एक प्रतिसंसार रचना था। उनका यह कहना सौ फीसदी सही है कि लेखन गलतफहमियों में मगन रहना सिखाता है चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही विपरीत क्यों न हों।

इस संस्मरणात्मक आख्यान की विशेषता यह भी है कि यह स्वयं पर ही केंद्रित न होकर आम आदमी की ओर भी आत्मीय दृष्टिपात करता है। समकालीन लेखन पर टिप्पणी करता चलता है। असल-नकल के धुंधले पड़ते दायरे पर भी चर्चा करता है। लेखक के समर्थन मूल्य पर बात करने की ज़रूरत पर बल देता है। बताता है कि यह ऐसा विचित्र समय है जब तटस्थ लाभान्वित हो रहे हैं।

स्त्री के तन्हा रहने के अनुभवों पर यहाँ कायदे से फोकस किया गया है। अकेली स्त्री संदेह के दायरे में रखी जाती है। उसके संपर्क के लोग अनुशासित न रहने की छूट ले लेते हैं। सहारा देती है क्रॉसवर्ड पहेली। इसके जरिए सब कुछ भुलाया जा सकता है। पर क्या सब कुछ कभी भुलाया भी जा सकता है?

वाचक को स्मरण हो आते हैं वे दिन जब उसका पहला अंग्रेजी कविता संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हुआ। ओमप्रकाश जी मिलने आए। और फिर अनेक यात्राओं के विविधता भरे अनुभव। कवि-संस्मरणकार जब किसी स्थायी अनुपस्थिति को शब्द देता है, तब यह कविता कागज़ पर उतर आती है —

“आजकल कमरे में कोई रहता है।
रात-दिन, सुबह-शाम
सिगरेट के कश लेते हुए।
सिर के नीचे दो तकिए लगाकर
ग़ालिब का दीवान पढ़ा करता है।
हिन्दी का अदीब, उर्दू का दीवाना है।
दीवानगी उस पर बड़ी जल्दी छा जाती है
न खुद नौकरी की
न मुझे चैन से करने दी।
हर धारा के विपरीत बहा करता है।
उसमें हज़ार विरोधाभास हैं
मानता है अपने को सही, दुनिया को ग़लत
फिर भी इस आदमी से मुहब्बत है मुझे।
रात में दीवार से उतर
मेरे पास आकर लेट जाता है।
मैं उसके मोज़े उतारती हूँ
वह मेरा चश्मा।
सारे मौसम बदल जाते हैं उस वक्त।”

क्या इस कविता को किसी व्याख्या की दरकार भी है? यही नहीं, अस्पताल के अनुभवों में अपने रवि की याद भी ऐसी है। यह स्मृति आख्यान रवि की वीरताओं और ममता की भीरुताओं का जगह-जगह उल्लेख करता है। यहाँ नये-पुराने अच्छा पढ़े की स्मृतियाँ हैं तो अच्छे लोगों की यादें भी। निचाट अकेलेपन के अनुभव हैं जिनमें कबूतरों की उपस्थिति और अनुपस्थिति का विरल अहसास है। वाचक का अपनी मनःस्थिति का दो टूक अंकन बता रहा है कि उसे अब न निकटता किसी की बर्दाश्त है और न ही दूरी। परिंदे उसके भीतर-बाहर फड़फड़ा रहे हैं।

अलग-अलग जगहों में जिया जीवन यहाँ अलग-अलग स्मृतियाँ लेकर उपस्थित हुआ है। बंबई की यादों में भारती हैं जिन्होंने पहली मुलाकात में ममता को ‘एन एडिशन टु बॉम्बे’ कहा था। उनकी रचनाओं का प्रभाव ममता के पाठक पर था। पुष्पा जी से मिला अपनापा ममता को याद रह जाता है, तो सरलमना भारती जी भी। नहीं, स्मृतियों में बनी हैं कान्ता भारती की नम आँखें भी। याद है कि भारती ने कभी ‘धर्मयुग’ के लिए कुछ कविताएँ माँगी थीं। यह भी कि कमलेश्वर के ‘सारिका’ में आने से वातावरण में परिवर्तन हुआ था। विषमतामूलक इस परिवर्तन में नई कहानी बनाम अकहानी की लड़ाई थी।

इलाहाबाद में फ़िल्म देखकर लौटने पर लड़कों से झगड़ा तो दृश्य होता ही है, इस युगल के संघर्षों से बेखबर घरवालों की इनके बच्चे की प्रतीक्षा हास्यास्पद है। पटना कथा-समारोह की विरल स्मृतियाँ हैं, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह से मिलने की याद है और सुविधारहित एक बड़े सम्मेलन के अविस्मरणीय रंग हैं। कहानी माँ बनने की भी है और इसमें विलंब का कारण वाचक ने बताया है रात को लिखने की अपनी आदत।

बच्चों के बारे में छोटी-छोटी घटनाओं से जुड़कर बनी बड़ी स्मृतियाँ हैं और है उनके बड़ा हो जाने की दास्ताँ। कुल जमा नतीजा ये कि वे माँ-पिता के रास्ते पर नहीं चले। बहरहाल, इलाहाबाद की यादों में अटका है कमलेश्वर का मैत्रीपूर्ण बर्ताव और उनके व्यक्तित्व का जादू। सादी किंतु महत्त्वपूर्ण गोष्ठियों का वह समय वाचक ने संजीदगी से याद किया है। इनमें न कोई ताम-झाम हुआ करता था न स्मरणीय बनाने के फोटोग्राफी जैसे कृत्रिम उपाय। घर पर होने वाली एक ऐसी गोष्ठी में मेजबान रवीन्द्र कालिया का अंत में पहुँचना ही नहीं, उसके कारण को आधार बना कमलेश्वर की लंबे समय तक चली छेड़छाड़ रसवान है। यही नहीं, कमलेश्वर का सहज आत्मीय, मददगार व्यक्तित्व और बेमिसाल कल्पनाशीलता व व्यावहारिकता का अंदाज़ कौन भुला सकता है!

मुड़कर अतीत को टटोलने, पारिवारिक चरित्रों की पहचान करने, बचपन और घर की स्मृतियों में डूबने-उतरने, साहित्यिक जीवन के अवलोकन, मायके और ससुराल के तुलनात्मक अध्ययन और बदलती जगहों में बदलते जीवन की स्मृतियों के अंकन की दृष्टि से यह संस्मरणात्मक गद्य एक खूबसूरत कोलाज की निर्मिति करता है। एक अर्थ में यह ‘रविकथा’ का पूरक भी है और आवश्यक विस्तार भी। यहाँ जीवन और समय की स्मृतियों का रचनात्मक रूप प्रभावित करता है।

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शेषकथा‘ : ममता कालिया
सेतु प्रकाशन

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