चाय बागानों का शहर ‘दार्जिलिंग’ 

विनीता बाडमेरा

बहुत ख्वाहिश कहां है मेरी ज़िन्दगी से! बस चाहा तो इतना कि इतनी बड़ी दुनिया में से बहुत छोटी-सी दुनिया तो मैं देख ही सकूं। फिर ज़िन्दगी ज़रुरी नहीं कि चार दिन की ही हो लेकिन आठ दिन की भी होगी ही किसे खबर! उम्रदराज होती मेरी मां और सासू मां को पूछती हूं,”अब तक जो संसार नहीं देखा,उसको देखने मेरे साथ चलना चाहोगी?”वे इन्कार में सिर हिला कभी अपने घुटनों को देखती हैं तो कभी अपनी तेज सांसों से कोई जवाब मांगती हैं। मेरे हाथ भी अनायास अपने ही कभी-कभार दर्द करते घुटनों पर चला जाता है और मैं मन ही मन ख़ुद से कोई वादा करती हूं।

कितनी  ही दफा मैंने कोशिश की कि ये औरतें बाहर की दुनिया देखने मेरे संग चलें पर अब उन्हें ख़ुद पर ही भरोसा नहीं रहा तो भला मुझ पर वे भरोसा क्यों ही करतीं! खैर साथी ने दार्जिलिंग चलने का सुझाव दिया जिसे बिना किसी ना-नुकुर के सहर्ष मान लिया गया।

 तयशुदा दिन उन्नीस अप्रैल आया और हम अजमेर से चेतक एक्सप्रेस में दिल्ली के लिए बैठे और बीस तारीख को सुबह न्यू जलपाईगुड़ी के लिए ट्रेन बदल ली। इन्हीं दिनों वेस्ट बंगाल में चुनाव होने थे इसलिए ट्रेन खचाखच भरी थी। ए.सी. के सैकेंड क्लास में भी इतनी भीड़ थी कि मानो हर बंगाली अपने मताधिकार के प्रति जागरूक है। बाथरूम के बाहर तक भीड़,किन्तु कोई कुछ नहीं कर सका। न टीसी और न रेलवे पुलिस ही। हम और हम सरीखे अन्य यात्रियों ने रात होते-होते अपने सूटकेस पर ताले जड़ना शुरू कर दिया और सीटों के नीचे लगे कुंदे में चेन लगा दी। कारण कोई पूछे तो जवाब यही कि ‘भरोसा’ शब्द इन दिनों शब्दकोश से गायब जो हुआ है।

रात बीती और 21 अप्रैल की सुबह हम न्यू जलपाईगुड़ी पहुंच गए। शेयरिंग में टाटा सूमो गाड़ी की जिसका एक जन का किराया 350 रुपए था। गाड़ी चलने के कुछ देर बाद ही ऊंचे लंबे पेड़ दिखना शुरू हो गए। खिड़की के पास सीट होने के कारण दार्जिलिंग पहुंचने तक निगाहें बाहर ही लगी रहीं। जहां तक नज़र गई हरियाली ही हरियाली। ज्यों-ज्यों हम ऊंचाई पर पंहुचने लगे ठंड दस्तक देने लगी। मुझे यह आश्चर्य ही लगा कि जहां राजस्थान बुरी तरह तप रहा है वहां भारत का कोई हिस्सा ऐसा भी है जहां ‘गुलाबी ठंड’ है।  

  घुमावदार रास्ते ख़त्म हुए। हम दार्जिलिंग पहुंच चुके थे। बिटिया ने ‘होम स्टे’ बुक कराया था। हमने हमारे इसी अस्थाई निवास पर फोन किया और एक चुलबुली नेपाली लड़की जिसकी उम्र लगभग सत्रह- अठारह के आस-पास थी, कुछ ही देर में हमारे पास आ खड़ी हो अभिवादन में सिर झुकाने लगी। हम उस प्यारी लड़की की मुस्कुराहट के कायल हुए। उसने सामान एक तरफ रखा और कहा ,”इसे पोटर ले आएगा, आप हमारे साथ चलें।”

हमारी गाइड बनी वह लड़की हाथ पकड़ ढलान के रास्ते से ले जाने लगी। एकबारगी ढलान देख घबराए और सोचा कि चार दिन इसी रास्ते से आना-जाना कैसे संभव होगा! छोटी पगडंडी और रास्ता कठिन, जो थोड़ा भी ध्यान भटका तो न जाने कहां गिरेंगे इसका अनुमान भी लगाना मुश्किल था। हम हांफ रहे थे। लड़की हमारी फूलती सांस देख थोड़ा उदास हुई। चेहरे पर आते भावों को पढ़ने की कोशिश कर उसने अपनी हिन्दी में कहा, ” आप जब घूमने जाएगा तो मैं आपको रोज ऊपर छोड़ने और लेने आएगा। आप परेशान मत हो।” 

 स्नेह की डोर बंधी। करार आया। होम स्टे पहुंचे तो दरवाजे पर तीन कुत्ते इंतजार में पलक पांवड़े बिछाए बैठे थे। शेर जैसे कुत्ते देख मन ने कहा,”डर के आगे जीत है।” उन तीनों ने जब दुम हिलाई तो मैंने ख़ुद की पीठ थपथपाई। 

 सफर से थके मांदे हम होम स्टे के भीतर पहुंचे। हॉल में सामने की दीवार पर दलाई लामा की बड़ी तस्वीर लगी थी। तस्वीर के नीचे आधुनिक दीपक जल रहा था।गर्मजोशी से स्वागत करती हमारे होमस्टे की मालकिन ने हमें अपना कमरा और कमरे से लगी बालकनी दिखाई। खूबसूरत बालकनी देख मन बल्लियों उछलने लगा। उबड़खाबड़ रास्ते की शिकायत तो कहीं छू मंतर हो गई। 

  घने कोहरे की चादर पेड़ों को ढक रही थी और बादल किस से मिलने जा रहे थे पता नहीं। सब कुछ धुंआ-धुंआ। लेकिन ये धुंआ आंखें जलाने वाला नहीं ठंडक देने वाला था। आस-पास लगे एक जैसे पेड़ इंसानों से ज्यादा अच्छे, कोई किसी की जड़ नही काट रहे थे बल्कि सहयोग देते लगे। साथी बालकनी में आ मुस्कुराए। मैंने कहा,”मैं ख़ुद के मरे नहीं, जीते जी ही स्वर्ग  देख रही हूं !” वे हंसे। हमारे अस्थाई घर के किसी कोने से आवाज आई। “जल्दी नहा लीजिए। खाना तैयार है।” 

   नहा कर डायनिंग हॉल में पहुंचे तो अपने घर-सा आभास  हुआ। होटल और होम स्टे का मतलब समझ आया। मेजबान कहूं या होम स्टे की मालकिन कहूं, उन्होंने बहुत प्यार से हमारे  लिए शाकाहारी भोजन तैयार किया था। चिली पनीर में सोया सॉस और रोटी में खमीर उठा था। दाल कम मिर्च की और चावल में भी सोयाबीन। एक नए स्वाद से हमारा परिचय  हुआ। पेट की आग शांत हुई तो आंखें आलसी रुख अपनाने लगी। लगभग पांच बजे नींद खुली तो हम तैयार हो ड्रांइगरुम में आए। दार्जिलिंग में उगी चाय की खुशबू घर भर में फैल रही थी। दो कपों में ग्रीन टी और बिस्कुट के साथ वही नेपाली बच्ची मुस्कुराते मिली। साथ चाय पीते- पीते ही बचे आधे दिन पर बात हुई । मेजबान ने माल रोड घूमने का सुझाव दिया। आधे दिन को सार्थक करने की ख़्वाहिश ने जोर पकड़ा। 

दार्जिलिंग में सामान्य टैक्सी, बस, ई रिक्शा आदि का नितांत अभाव है। यहां शेयरिंग टैक्सी टाटा सूमो ही चलती है। हमने एक शेयरिंग गाड़ी को हाथ दे रोका। इस टैक्सी ने माल रोड  के नीचे उतारने के एक जन के पैंतीस रुपए लिए। एक बार फिर हमें चढ़ाई कर माल रोड तक पहुंचना था। हम माल रोड पहुंचे तो सांस फूल रही थी। मां और सासू मां की स्थिति समझ आ रही थी। खैर हमने देखा कि यह मुख्य चौराहा था। ऊनी कपड़ों और स्थानीय हस्तशिल्प की अनगिनत दुकानें थी। कई तरह के स्ट्रीटफूड थे। नॉनवेज खाने के शौकीन के लिए यह बेहतरीन जगह थी किन्तु वेज खाने वालों के लिए यहां अधिक विकल्प नहीं थे। सैलानियों की भीड़ दुकानों पर देखी जा सकती थी। मैंने भी ऊनी कपड़े की एक दुकान से फुल जैकेट और साथी ने हॉफ जैकेट बहुत ही किफायती मूल्य पर खरीदी। हम घूमते- घूमते थक गए थे तभी हमारी नजर एक वेज रेस्टोरेंट  पर पड़ी। हमने फोन कर अस्थाई घर पर रात के खाने के लिए मना किया और उस रेस्टोरेंट में खाना खाया। माल रोड पर वाहनों का आना पूरी तरह प्रतिबंधित था। हम फिर नीचे आए और टाटा सूमो की शेयरिंग गाड़ी से अपने अस्थाई निवास पहुचे। चार दिन में से एक दिन पंख लगा उड़ चुका था। थके कदम बिस्तर पर पहुंचे और हम निढाल हुए। 

  तेईस अप्रेल को चूंकि दार्जिलिंग में मतदान था। इसलिए बाईस अप्रेल को किसी तरह का कोई वाहन मिलना मुश्किल था। वाहन का न मिलना भी हमारे लिए फायदेमंद रहा। अस्थाई निवास के परिवार के सदस्यों ने पैदल-पैदल ही आस-पास की मोनेस्ट्री (बौद्ध मठ) देखने की राय दी। हमने नाश्ता किया और खूबसूरत मौसम में हम अपनी तरह से घूमने निकल पड़े ।

 पैदल चलते- चलते ही हमने तीन मोनेस्ट्री देखी। मैंने कितनी ही दफा चर्च और गुरुद्वारा देखा। मस्जिद भी कई बार गई हूं मंदिर तो खैर मेरे संस्कार में है। हालांकि मैं कभी कट्टर धार्मिक नहीं रही पर मोनेस्ट्री, महात्मा बुद्ध का मंदिर देखने का पहला अवसर था। बाहर बड़े से घंटे लगे थे जिन पर वहां के स्थानीय लोग हाथ फेर रहे थे। उन पर बहुत सारे मंत्र लिखे थे। उनका अर्थ मैं नहीं जानती फिर सब कुछ जानना ज़रूरी भी तो नहीं तथापि मैंने उनकी देखा-देखी उन घंटों पर हाथ फेरा। कुछ तो है जिसे शब्दों में अभिव्यक्त नही किया जा सकता। मोनेस्ट्री के भीतर गए तो बड़ी-सी बुद्ध की मूर्ति थी। दलाई लामा की तस्वीर थी। कोई भीड़ नहीं। किसी से धक्का-मुक्की नहीं। कहीं शोर नहीं। प्रसाद और चादर खरीदने की आवाज़ लगाते  मोनेस्ट्री परिसर में कोई ऐसा दुकानदार नहीं। मन हो तो वहां मंदिर के परिसर की दुकानों से घर के लिए  सजावटी सामान खरीद लें। बुद्ध की कोई छोटी मूर्ति ले लें। जहां तक नज़र गई बौद्ध भिक्षु दिख जाते। छोटे बौद्ध भिक्षु देख जी जाने कैसा हो गया!  इस तरह थोड़ी- थोड़ी दूरी पर एक के बाद एक तीन मोनेस्ट्री देखी। बीच में जब थक जाते तो किसी दुकान के बाहर बैठ वहां के घरों की छतों और बालकनियों में सजे अनगिनत  रंग- बिरंगे फूलों को देखते । यहां के लोग बहुत ही प्रकृति प्रेमी हैं। नोट तो चलते- चलते यह भी किया कि सड़कों पर जरा भी कचरा नहीं दिखता। एक स्व अनुशासन की भावना से जी रहा है यहां का हर बाशिंदा।

   आस-पास का बाजार हो या कैफे हर जगह मुस्कुराती, चुस्त-दुरुस्त, आकर्षक परिधान पहने नेपाली महिलाएं अपने काम से प्रेम करती दिखी। चलते-चलते जब थक गए और थोड़ी भूख लगी तो किसी छोटे कैफे में रसेदार मैगी खाई। इन ठंडी हवाओं में, यहां के पानी में मैगी का स्वाद भी अलग था। कितना आसान बना लिया है यहां के पहाड़ी लोगों ने अपना जीवन। बिना दिखावे और होड़ा-होड़ी का। परिश्रम से जी न चुराने वाले ये लोग अधिक संग्रह में विश्वास नहीं करते। मेरे ख़याल से शायद इसका कारण इनका बौद्ध धर्म में विश्वास होना भी हो सकता है।

 प्रकृति अपना काम कर रही थी। दिन धीरे-धीरे खत्म होने को था । शाम अपना जलवा बिखेरने की तैयारी में थी और हम पैदल ही लूपबदासिया जा रहे थे। यहां पर प्रवेश करने का शुल्क था। कारगिल में शहीद हुए नेपाली लोगों को समर्पित इस स्थान को देखने के लिए भी थोड़ी कसरत ज़रूरी थी। बहुत  खूबसूरत रंग-बिरंगे फूलों का यह बगीचा मन मोह लेता है।  लूपबदासिया में खड़े हम देख रहे थे तो दूर दूर तक पेड़ ही पेड़ और ढलवा छतों वाले नायाब घर। कुछ तस्वीरें लेना स्वाभाविक था, जाने फिर आना हो, न हो।

   हम जान चुके थे कि सूर्योदय व सूर्यास्त दार्जिलिंग में जल्दी हो जाता है और हमारी थकान भी चरम पर थी। अब हमें समय पर अस्थाई निवास पहुंचना जरुरी लगा। फिर वो घर भी तो हमारा इंतजार कर रहा था। हम लौट रहे थे उस घर में। अब यहां रहते दो दिन हो चुके थे। अभ्यास में ताकत है तभी तो जो रास्ता कल तक मुश्किल लग रहा था, वह अब इतना मुश्किल भी नहीं लग रहा था। हम घर पहुंचे तो वहां के परिवार के मुखिया ने वेज मोमोज परोस हमें सरप्राइज दिया। हम राजस्थानी दाल बाटी भले ढंग से बना लें किन्तु इतने अच्छे मोमोज तो नहीं बना सकते। मेरे होंठ बुदबुदाएं –

” जिस-जिस राही से स्नेह मिला उस- उस राही को धन्यवाद।”

   यह तीसरा दिन था। हम सिक्किम के ‘नामची’ शहर देखने के लिए जा रहे थे। टाटा सूमो गाड़ी में मैं और साथी।  दार्जीलिंग से सिक्किम के नामची पहुंचने में तीन घंटे लगे। रास्ता काफी डरावना, खाइयों वाला लेकिन फिर भी खूबसूरत। कोई डराते हुए भी खूबसूरत हो सकता है, यह उस दिन जाना। पूरे रास्ते ‘ चीड़ और देवदार के लंबे पेड़’ मन मोह रहे थे। दूर से तीस्ता नदी भी दिखी। घुमावदार रास्तों से जी घबराया। बीच में गाड़ी रोककर चाय पी और स्थानीय केले खाए। ये केले आकार में बहुत छोटे और बीज वाले थे। थे। हमारे राजस्थान में तो छोटे और ऐसे बीज वाले केले देखने को भी नही मिलते।

दार्जिलिंग और सिक्किम के ड्राइवरों में यह आपसी सलाह से तय किया गया है कि वहां( दार्जिलिंग) का ड्राइवर यहां ( सिक्किम) लाकर छोड़ सकता है किन्तु साइडसीन नहीं दिखा सकता। ऐसा ही सिक्किम का ड्राइवर जब टूरिस्ट  को लेकर  दार्जिलिंग जाएगा तो करेगा। कोई किसी के पेट पर लात नहीं मारेगा। ‘सबको कमाना है’ इस सिद्धांत  का पालन सबको करना है। हम नामची पहुचें तो पहले से निश्चित स्थान पर नामची का ड्राइवर अपनी गाड़ी लिए हमारा इंतजार करता मिला। हम एक गाड़ी से दूसरी गाड़ी में बैठे अब हम सिक्किम  का कुछ हिस्सा देखने जा रहे हैं। खूबसूरत मंजिल पर पहुंचने के खूबसूरत रास्ते थे। गाड़ी रुकी सिक्किम के रावगलां में  और  हम ‘बुद्धा पार्क’ पहुंचे। गेट पर ही प्रवेश शुल्क था। पार्क में प्रवेश करने  पर दूर से ही भगवान  बुद्ध की बैठी हुई मूर्ति  दिखाई दी। पूछने पर पता चला कि यह मूर्ति 130 फीट ऊंची है और  कांस्य की बनी है। इस मूर्ति के नीचे ही मोनेस्ट्री थी। यहां दीवारों पर भगवान बुद्ध के जन्म से लेकर शरीर छोड़ने  की कहानी विभिन्न चित्रों से उकेरी गई  थी। दीवार पर अलग-अलग दलाई  लामा की तस्वीरें थी। इसके अलावा इस पार्क में संग्रहालय और ध्यान केन्द्रित करता हॉल भी था। बहुत विशाल  क्षेत्र में फैले इस पार्क की सुंदरता अद्भुत है, जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। 

 इसके बाद हम पहुंचे ‘गुरु रिनपोछे’ के मुख्य स्थल पर। गुरु रिनपोछे जिसे स्थानीय लोग पद्मसंभव भी कहते है। समुद्रपत्से पहाड़ी पर  इनकी 135 फीट ऊंची विशाल सुनहरी मूर्ति है। गौर से देखने पर लग रहा था कि गुरु रिनपोछे की मूंछे थी और उनकी गुस्से से भरी आंखें आग उगल रही थीं। मूर्ति के हाथों में अस्त्र-शस्त्र देख मुझे भगवान परशुराम जी याद आए। मोनेस्ट्री से बाहर आ मैंने ड्राइवर जी से इसका कारण पूछा तो वे कोई  संतुष्ट करता जवाब नहीं दे सके।

अब हम ‘सोलोफोकचारधाम’  पहुंचे। नामची के इस प्रमुख स्थल में भगवान शिव के सोलह  ज्योर्तिलिंग  तथा  बद्रीनाथ,  जगन्नाथ,रामेश्वरम  और द्वारका के मंदिरों की प्रतिकृतियां बनी हुई है। साथ ही भगवान शिव के एक बड़े मंदिर के ऊपर  108 फीट ऊंची शिव प्रतिमा  है। और इसी मंदिर के अंदर जाने पर शिवलिंग के अतिरिक्त नटराजन की विशाल मूर्ति है। दीवारों पर ‘शिव पार्वती’ विवाह की कहानी चित्रों के माध्यम  से उकेरी गई है। चार धाम के इस मंदिर परिसर में अनेक रंगों के फूल थे जिसमे काले और सफेद फूल सैलानियों के आकर्षण का विशेष केन्द्र थे।

 सूर्य अस्त होने को था। हम फिर लौट रहे थे अपने अस्थाई घरोंदे  की तरफ। लौटना सुखदायक है। यह दिन भी बीता लेकिन अन्य दिन से बेहद अलग, खुशी और आह्लाद से भरता हुआ। 

    घर का मतलब घरवालों का होना है। हमारे ये घरवाले हमारी प्रतीक्षा में थे। हम बच्चों की तरह आज देखे गए दर्शनीय स्थल के बारे में बता रहे थे और वे मुस्कुराते हुए सुन रहे थे। हमारे कहने से अधिक उनका सुनना  मुझे सुख दे रहा था। हर किसी को यह सुख नसीब  नही हैं। होम स्टे के मुखिया फौजी भाईसाहब अपने फौज के किस्से सुनाने लगे और अब मैं दातों तले अंगुली दबा रही थी। गपशप और रात के डिनर ने ग्यारह बजा दिए। आंखें जब बिना प्रयास मुंदने लगी तो हम बिस्तर की ओर चले।

  पच्चीस अप्रैल को दार्जिलिंग में हमारा अंतिम दिन था।  आज हमें दार्जिलिंग के साइडसीन देखने जाना था। सुबह  अलग अंदाज और स्वाद देते छोले भटूरे और ग्रीन टी का नाश्ता किया । ढलान वाले रास्तों से मशक्कत करते ड्राइवर  के बताए स्थान पर पहुंचे तो पाया कि दार्जिलिंग के साइडसीन दिखाने के लिए गाड़ी में बैठे ड्राइवर भैया हमारा ही इंतजार कर रहे थे। समयकी पाबंदी देख मैं फिर हैरान हुई।

 सुबह नौ बजे के आस-पास  सर्द हवाएं चल रही थीं लेकिन यह डराने वाली नहीं मन मोहने वाली थी। गाडी में पुरानी फिल्मों के गाने चल रहे थे। संगीत में खोए हम पहुंचे  ‘टाइगर  हिल’ जहां से बर्फीली कंचनजंगा दिखती है। सैलानी यहां अलसुबह ही सूर्योदय  देखने आते हैं। खराब  मौसम के कारण ही हम देर से टाइगर हिल आए लेकिन इतनी देर से आने पर भी कंचनजंगा नहीं दिखी। हमें कंचनजंगा न देखने का अफसोस रहा। हम टाइगर हिल से नीचे उतरे तो ड्राइवर  ने ‘देवी मंदिर’ पर गाड़ी रोकी। हमने वहां हाथ जोड़ मां को अब तक की सफल यात्रा के लिए धन्यवाद दिया।

   एक बार  फिर कानों में पुराने गानों का संगीत सुनाई  देने लगा। गाड़ी दार्जिलिंग के जू पर जाकर रुकी। जू का प्रवेश शुल्क था। हम टिकट ले जू में आए तो अनेक ऐसे जानवर देखे जो अनुमानतः अन्य चिड़ियाघरों में देखना दुर्लभ था। याक,वाइट टाइगर और रेडपांडा देख बच्चों जैसे आश्चर्य से आंखें फैल गईं।  कई तरह के रंग-बिरंगे पक्षियों को देख लोग फोटोग्राफी का आनंद  ले रहे थे। इसी जू के एक हिस्से में तेनजिंगनोर्गे का संग्रहालय था। उनके कपड़े व उनके अन्य कई जरुरी सामान रखे थे। इतनी कठिन चढाई कैसे वे चढ़े होंगे यह सिर्फ हम अंदाज लगा सकते हैं। इसी तरह जू के एक हिस्से में संग्रहालय था। कई मृत जानवर व पशु-पक्षी के कंकाल थे।

 इस जू को देखना रोमांच से भर गया। मुझे लगता है इसे देखने के लिए पूरा दिन चाहिए तब और भी भली प्रकार से इसे देख सकते हैं। हमें और भी दर्शनीय स्थल देखने थे इसलिए जू से बाहर आए। अब हमने फिर ‘मोनेस्ट्री देखी। इस मोनेस्ट्री में संग्रहालय भी था। यहां भी प्रवेश शुल्क था। इस संग्रहालय में बौद्ध धर्म किन-किन देशों में फैला है उसकी जानकारी के साथ बौद्ध भिक्षुक के काम में आने वाले कई बर्तन व ज़रूरी सामान इत्यादि भी थे। 

मोनेस्ट्री के परिसर में स्कूल था जहां छोटे बौद्ध भिक्षु पढ़ने  जाते हैं साथ ही पता चला कि यहां पर वृद्धाश्रम व एक अस्पताल  भी था। स्कूल और अस्पताल के साथ वृद्धाश्रम  भी इन दिनों ज़रूरी हो गया है? मैं यह ख़ुद से पूछने लगी लेकिन कोई जवाब नहीं था। मन उदास हो गया था। तभी साथी ने स्कूल की कैद से छूटे छोटे लामा दिखाए जो बिल्कुल शैतानी करने के मूड में थे। उनका एक दूसरे लामा को छेड़ना और भागना देख मैं ख़ुद को रोक नहीं पाई और उसी अंदाज में फोटो खींच ली।

  किसी मित्र ने चाय बागान को रोप वे से देखने की बात कही थी। हमने ड्राइवर से कहा तो उन्होंने बताया कि हम वहीं चल रहे हैं पर रोपवे का टिकट शायद ही मिल सकें । एकबारगी मन उदास  हुआ। लेकिन जैसे ही पहुंचे टिकट खिड़की खुली देखी और हम एक जन का साढ़े तीन सौ का टिकट ले रोपवे में बैठे। उतनी ऊंचाई से चाय के बागानों  और उन बागानों से पत्तियों को तोड़ती सिर पर टोकरी संभालती महिलाएं देखना अद्भुत था। करीब चालीस मिनट इस प्रकिया में लगे लेकिन यह आनंद अन्यत्र दुर्लभ है। यहां आना ही किसी सपने की मानिंद लग रहा था। हमने यहां से चाय की पत्ती खरीदी।  

 अब फिर एक मोनेस्ट्री थी और वहीं जापानी सफेद रंग का पैगोडा निहारा। ऐसा पैगोडा देख भला कौन फोटो नहीं खींचता!

 दिन बीत गया और हम निढ़ाल हो अस्थाई घर पहुंचे। डिनर के लिए इस घर के सदस्य हमारा इंतजार कर रहे थे। हमने उन्हें आज के बीते दिन के बारे में बताया । बातें करते-करते हम भावुक हुए जा रहे थे क्योंकि दूसरे दिन हमें लौटना था।

 हम लौट रहे थे छब्बीस की सुबह। सामान पैक किया तो मन  ने कहा,”दिल कहे रुक जा  रे रुक जा,  यहीं पे कहीं, जो बात इस जगह है कहीं पर नहीं….।” पर लौटना तो पड़ता ही है। घर के कुत्ते मेरे पैरों को चाटने लगे। उनसे दोस्ती हो गई थी इसलिए कोई डर नहीं था। चार दिन जाने कैसे बीते! मेजबान  और हम दोनों उदास थे। भारी मन से गले मिले उन्होंने अपने स्नेह को रेशमी सफेद कपड़े का दुपट्टे -सा ओढ़ा  कर प्रकट किया। बच्चों से गले मिली। हम कठिन रास्ते पार कर फिर  मुख्य सड़क पर आए तो लगा कुछ पाने के लिए कुछ तकलीफ तो उठानी ज़रूरी थी। क्या पाया कैसे बताएं जो पाया वो अनमोल था।

 टाटा सूमो की शेयरिंग गाड़ी न्यूजलपाईगुड़ी ले आई, यह हमे अहसास तब हुआ जब हमने जैकेट उतारी। पसीना बहने लगा। हम फिर प्रदूषण  भरी दुनिया में लौट रहे थे। टॉय ट्रेन  कई बार देखी लेकिन  समय की कमी के कारण नहीं बैठे।  हम फिर जाएंगे टॉय ट्रेन के बहाने से ही सही, इन हरी भरी वादियों को निहारने। सिलीगुड़ी से हमारी ट्रेन दिल्ली तक थी और दिल्ली से अजमेर तक के लिए हमने ट्रेन बदली। हम लौटे थे अपने शहर…अपने घर।

***

 विनीता बाडमेरा

राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से पहली पुस्तक ‘ एक बार आख़िरी बार’ प्रकाशित। महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में कविता व कहानियां प्रकाशित।

Vbadmera4@gmail.com

 

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