आस्था का नया समाजशास्त्र- ‘काँवड़ यात्रा’ के सामाजिक-राजनीतिक नेपथ्य की पड़ताल

Kanwar-yatra
नरेश गोस्वामी की हालिया कृति ‘काँवड़ यात्रा: लोकधार्मिकता का नेपथ्य’ हिंदी में मौलिक समाज-विज्ञान लेखन की एक महत्वपूर्ण कृति है। यह पुस्तक काँवड़ यात्रा को महज एक पारंपरिक धार्मिक आस्था, श्रद्धा के प्रदर्शन या किसी एकतरफा राजनीतिक साजिश के रूप में देखने के सरलीकृत विमर्श को तार्किक रूप से खारिज करती है। लेखक इस वृहद् परिघटना को समकालीन सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों, तीव्र शहरीकरण, अनौपचारिक राजनीति और बदलती शक्ति-संरचनाओं के जटिल जाल के भीतर रखकर विश्लेषित करते हैं। पुस्तक मुख्य रूप से धर्म, बाजार और राजनीति के उस अंतर्गुंफित त्रिकोणीय संबंध को उजागर करती है जो आधुनिक भारत की लोकधर्मिता को संचालित कर रहा है।
संगठनात्मक ढांचा और अनौपचारिक राजनीति
गोस्वामी अपने फील्डवर्क के आधार पर दर्शाते हैं कि यह यात्रा अब केवल एक स्वतःस्फूर्त व्यक्तिगत आध्यात्मिक उपक्रम नहीं रह गई है। इसके पीछे काँवड़ समितियों, स्थानीय नेताओं, नव-धनिक वर्ग और व्यावसायिक सेवा संगठनों का एक बेहद सुव्यवस्थित अनौपचारिक प्रबंधन तंत्र सक्रिय है। यह ढांचा न केवल विभिन्न जातियों को गोलबंद करता है बल्कि स्थानीय स्तर पर एक प्रभावी दबाव समूह (Pressure Group) के रूप में कार्य करता है। लेखक का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि इस धार्मिक उपक्रम ने समाज के परिधि या हाशिये पर रहने वाले समूहों को सत्ता-संरचनाओं तक पहुँचने का एक नया प्रवेश द्वार (Gateway) दिया है। जहाँ से वे अपनी बुनियादी समस्याओं को राजनीतिक पटल पर उठाने में सक्षम होते हैं। इस प्रकार मार्ग में दिखने वाले राजनीतिक व धार्मिक बैनर-पोस्टर केवल श्रद्धा के प्रतीक न होकर स्थानीय नेतृत्व और सामूहिक शक्ति के प्रदर्शन के माध्यम बन जाते हैं।
हिंदुत्व की पृष्ठभूमि और स्वायत्त लोक-संस्कृति
वैचारिक धरातल पर लेखक विश्व हिंदू परिषद की एकात्मकता यात्रा (1983) और रथयात्रा (1990) जैसी हिंदुत्ववादी लामबंदियों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हैं। जेम्स लोक्टफेल्ड जैसे विद्वानों के हवाले से पुस्तक स्वीकार करती है कि हिंदुत्व की रणनीति में सार्वजनिक अनुष्ठानों के जरिए ‘सार्वजनिक स्पेस’ (Public Space) पर दावेदारी मजबूत की जाती रही है। इसके बावजूद लेखक क्रिस्टोफ जाफ्रलो (जेफ्रेला) के मत को प्रमुखता देते हुए स्पष्ट करते हैं कि काँवड़ यात्रा को पूरी तरह किसी राजनीतिक दल की थोपी हुई परियोजना या उसका प्रतिरूप कहना गलत होगा। इसकी अपनी एक स्वतंत्र और विशिष्ट सांस्कृतिक जमीन है जो लोक-परंपरा की सामूहिक स्मृति में गहराई से निहित है। चूँकि सामाजिक स्पेस पूरी तरह समरूप या एकाश्मिक (Monolithic) नहीं है इसलिए इस यात्रा की लोकधर्मिता की अपनी एक स्वायत्त पहचान बनी हुई है।
राज्य की भूमिका और सेकुलरवाद की सीमाएँ
यात्रा के स्वरूप को एक व्यापक प्रबंधित प्रदर्शन (Managed Spectacle) में बदलने में राज्य की प्रशासनिक भूमिका निर्णायक रही है। पुस्तक 1990 के दशक से राज्य सरकारों द्वारा (जैसे दिल्ली में 1995 से) शिविर, भोजन, विश्राम और सुरक्षा की व्यवस्था करने की शुरुआत को रेखांकित करती है, जो वर्तमान समय में (विशेषकर 2017 के बाद उत्तर प्रदेश में) मार्ग प्रबंधन और पुष्प-वर्षा जैसे प्रतीकात्मक कदमों तक पहुँच चुकी है। आशीष नंदी और टी.एन. मदन के विचारों के आलोक में लेखक पारंपरिक सेकुलर विमर्श की सीमाओं पर तीखी चर्चा करते हैं। वे बताते हैं कि मुख्यधारा का सेकुलरवाद अक्सर जनसाधारण की स्थानीय परंपराओं से असंपृक्त रहा, जिसके परिणामस्वरूप छोटी सामाजिक पहचानों की बेचैनी काँवड़ जैसी बड़ी घटनाओं में समायोजित हो रही है, जो आस्था और पर्यटन का एक सबाल्टर्न (निम्न-वर्गीय) संस्करण भी प्रस्तुत करती है।
जातिगत गतिशीलता और हाशिये का युवा वर्ग
जाति और वर्ग के आंतरिक विश्लेषण के स्तर पर यह पुस्तक पारंपरिक सामाजिक पदानुक्रम में आने वाले अहम बदलावों को रेखांकित करती है। समाजशास्त्री धीरूभाई लिंगोराजव शेठ के हवाले से लेखक स्पष्ट करते हैं कि यात्रा के संदर्भ-लोक में पारंपरिक अंतर्जातीय दूरियाँ और उनके कठोर नियम अस्थायी रूप से तिरोहित हो जाते हैं। “भोले” या “बम” जैसे साझे संबोधनों के कारण यात्रियों की जातिगत पहचान पूरी तरह गौण हो जाती है जो एक विशिष्ट सामाजिक समरसता को जन्म देती है। दिल्ली-एनसीआर जैसे शहरी परिधि (Urban Periphery) के क्षेत्रों में खेती के संकुचन, बेरोजगारी और गुमनामी से जूझ रहे निम्न व मध्यम वर्ग के युवा इसमें बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। उनके लिए यह यात्रा केवल धार्मिक कृत्य नहीं बल्कि अपनी सामूहिकता, पहचान और आत्म-सम्मान को प्रदर्शित करने का एक सशक्त माध्यम बनती है।
लगभग 178 पृष्ठों के अपने सीमित कलेवर के कारण पुस्तक में कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार सीमित रह जाता है। यात्रा में महिलाओं की भागीदारी, दक्षिणी या पूर्वी भारत की समानधर्मी धार्मिक यात्राओं से तुलना और हाल के वर्षों के व्यापक सांख्यिकीय आँकड़े इसमें अपेक्षित रूप से शामिल नहीं हो पाए हैं।
कुल मिलाकर नरेश गोस्वामी की यह पुस्तक उन पाठकों और शोधकर्ताओं के लिए मील का पत्थर है जो काँवड़ यात्रा को “आस्था बनाम उपद्रव” या “राजनीतिक साजिश” के घिसे-पिटे और सरलीकृत द्वंद्व से परे जाकर समझना चाहते हैं। लेखक का यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि राजनीति भले ही इस यात्रा को आकार देती और प्रभावित करती हो लेकिन आधुनिक भारत में लोक-आस्था और शक्ति-राजनीति हमेशा एक-दूसरे के नेपथ्य में सक्रिय रहकर ही इस महा-परिघटना को संचालित करती हैं।
हिंदी में गंभीर समाज-विज्ञान पढ़ने वालों के लिए यह कृति दीर्घकाल तक मार्गदर्शक बनी रहेगी।
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पुस्तक: काँवड़ यात्रा: लोकधार्मिकता का नेपथ्य
लेखक: नरेश गोस्वामी
प्रकाशक: सेतु प्रकाशन, 2026
पुरस्कार: प्रथम सेतु समाज विज्ञान पाण्डुलिपि पुरस्कार से सम्मानित
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समीक्षक:
प्रोफेसर नीलिमा पांडेय
प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विभाग
लखनऊ विश्वविद्यालय
लखनऊ

 

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