योगेंद्र आहूजा

अंतोन पाव्लोविच चेखव, जिनका जन्म 1860 में हुआ था और मृत्यु 1904 में, यानी सिर्फ 44 साल की जिंदगी उन्होंने पायी- सिर्फ रूसी नहीं, विश्व-साहित्य के सबसे प्रभावशाली लेखकों में एक हैं। उनके दादा एक ‘भू–दास’ यानी ‘सर्फ’ थे, जिन्होंने आज़ादी ‘खरीदी’ थी। (उन्होंने 1841 में अपने मालिक काउंट चेर्त्कोव को 3500 रूबल अदा कर खुद को और अपने परिवार को गुलामी से आज़ाद करवाया था।) ‘भू–दास’ होने का क्या अर्थ था, और 1861 में जार अलेक्जेंडर द्वितीय ने इसे खत्म किया तो यह रूस के इतिहास में कितनी बड़ी घटना थी, यहाँ इसकी चर्चा करना विषयांतर होगा। उनका बचपन गरीबी, डर और कठोर पारिवारिक अनुशासन में बीता। पेशे से वे डॉक्टर थे। बतौर लेखक उनकी पहचान एक ऐसे कलाकार की है जिन्होंने जिंदगी की बहुत आम, मामूली स्थितियों में गहरे मानवीय अर्थ खोजे। उनकी कहानियों और कथा-शैली ने आधुनिक कहानी की शक्ल ही बदल दी। आधुनिक कहानी के बारे में यह आम कहा जाता है कि वह गोगोल के ओवरकोट से निकली है, लेकिन वह चेखव की चुप्पी से भी निकली है। उनकी कहानियों से एक नया शब्द बना – ‘चेखोवियन’ जिसका मतलब है – सूक्ष्मता, खुला अंत और ज़िंदगी की वह अनकही बेचैनी जो बिना किसी शोर के पाठक के भीतर उतर जाती है। इसके अलावा उनके नाटकों ‘चेरी का बगीचा’, ‘तीन बहनें’, ‘अंकल वान्या’ और ‘द सी–गल’ ने रंगमंच की भाषा को बदल दिया। बाहरी नाटकीयता की जगह आंतरिक तनाव, पात्रों का सपनों और सच्चाई के बीच कहीं फँसे रहना, समय बीतने के साथ कुछ छूटते जाने की टीस, अधूरे प्रेम, और सामाजिक बदलाव की आहटें, यह उन्होंने नाटकों में जोड़ा।
‘चेखव’ की मृत्यु के बाद लिखे अपने एक मार्मिक संस्मरण में गोर्की ने लिखा था – जो भी शख़्स चेखव से मिलता, चाहने लगता कि वह कुछ और सच्चा, सादा हो सके और अपने असली, कुदरती रूप के करीब आ जाए। उनकी संगत में लोग बनावटी किताबी ज़ुबान और ऊँचे–ऊँचे, भारी–भरकम, चमकदार अल्फ़ाज़ का बाना उतार फेंकते थे, जिनसे हमारे रूसी अपने आपको सजाने का शौक रखते हैं। और – जब भी उनकी मुलाक़ात किसी ऐसे शख्स से होती जो ज़रूरत से ज़्यादा सजे–धजे, बड़े–बड़े बोल बोलता हुआ आता, तो उनकी ख्वाहिश होती कि उसे इन फालतू और बोझिल सजावटों से आज़ाद कर दें, क्योंकि यह ऊपरी चमक–दमक उसके असली चेहरे और ज़िंदा रूह को छिपा देती थी।
हर चटक, बनावटी या विदेशी चीज़, जिसे कोई शख़्स यूं ही अपनी अहमियत बढ़ाने के लिए ओढ़ ले, उन्हें नागवार गुजरती और उलझन में डालती थी। इसलिए चेखव, जो हमारे महान साहित्यिक पूर्वज और उस्ताद हैं – को याद करते हुए हमें भी अपने को भारी-भरकम शब्दों से अलग रखना चाहिए। हमें सिर्फ उनके असली चेहरे और जिंदा रूह की बातें करनी चाहिए। चेखव का ही अनुसरण करते हुए, या कहें – उनके साहित्य की आत्मा के अनुरूप – मैं बहुत सादा जुबान में बताना चाहता हूँ कि चेखव से मेरा रिश्ता कैसे जुड़ा और यह रिश्ता क्या है।
चेखव से मेरा परिचय निर्मल जी ने कराया था, इसलिए इस आलेख में उनका नाम बार-बार आयेगा। अब से आधी सदी पूर्व, जब अभी किशोर ही था – उनके आलेख – अंधेरे में एक चीख – से। ‘बीसवीं शताब्दी में साहित्य की जो विधा सबसे पहले अपने अन्तिम छोर पर आकर ख़त्म हो गयी, वह ‘कहानी’ थी । चेखव की कहानी ‘कहानी‘ का अन्त है–या दूसरे शब्दों में, उसके बाद ‘कहानी‘ वह नहीं रह सकेगी, जिसे आज तक हम कहानी की संज्ञा देते आये हैं। आज प्रश्न चेखव की परम्परा को आगे बढ़ाने का नहीं है, उससे मुक्ति पाने का है। सौभाग्यवश हिन्दी कहानी के सामने ऐसी समस्या नहीं है– वह अभी चेखव से भी बहुत पीछे है।‘
उस समय, जब मैंने एक भी कहानी नहीं लिखी थी, यह एक विलक्षण और ताकतवर बात लगी, लगभग अवाक और कुछ हताश करने वाली। तीव्र उत्सुकता हुई यह जानने की कि यह कौन लेखक है जिससे आधुनिक कहानी की शुरुआत हुई और बक़ौल निर्मल जी, उसी पर खत्म भी हो गयी।
दूसरा परिचय – ‘चेखव की बंदूक’ वाला सिद्धांत। ‘यदि कहानी में कहीं दीवार पर बंदूक टंगी है, तो अंत तक कहीं न कहीं उसे चलना चाहिए’। यह भी अपने में बहुत जबर्दस्त बात लगी, कहानी लेखन का पहला सूत्र। हाँलाकि मैं स्थूल अर्थों में इससे सहमति नहीं रखता। दीवार पर टंगी एक नाकारा सी बंदूक जो चलने की उम्मीद देती रहे मगर आखिर तक न चले- भी एक अर्थ व्यंजित कर सकती है। लेकिन इसका सूक्ष्म अर्थ यही है कि कहानी में अनावश्यक या फालतू ब्यौरे नहीं होने चाहिए, हर विवरण का एक प्रयोजन होना चाहिए- और इस अर्थ के मुताबिक, कह सकते हैं कि कहानी में बंदूक का न चलना अगर कोई अर्थ जोड़ता है, तो उसका न चलना भी दरअसल उसका ‘चलना’ ही है।
तीसरा परिचय भी निर्मल जी के ही मार्फत हुआ। चेखव ने गोर्की से कहा था – ‘अगर चाँदनी रात दिखानी है तो मलबे में एक टूटी हुई बोतल में चाँद का अक्स दिखाना काफी है’। यह मेरे लिए कहानी-लेखन का दूसरा सूत्र बना। हाँलाकि बाद में जब यह संस्मरण पढ़ा तो जाना कि इस बात को निर्मल जी ने ठीक नहीं समझा था। उन्होंने समझा कि चेखव का आशय था कि कहानी में लंबे अनावश्यक डिटेल्स नहीं होने चाहिए, जो बेशक उनकी दृष्टि का हिस्सा है – लेकिन इस उद्धरण में उन्होंने जो कहा था वह यह नहीं था। वह एक बिलकुल अलग बात थी। वह यह कि लेखक को कहानी में ‘दिखाना’ चाहिए, ‘बताना’ नहीं। “Don’t tell me the moon is shining; show me the glint of light on broken glass.” ज़ोर ‘रात’ और ‘चाँद’ पर नहीं, ‘दिखाने’ और ‘बताने’ पर था। यह उनकी कला-दृष्टि का हिस्सा था जो “showing” पर ज़ोर देती थी बनिस्बत “telling” यानी बताने पर। यह मेरे लिए कहानी-लेखन का तीसरा सूत्र बना।
चौथा परिचय। यह भी निर्मल जी से ही जाना था- “मैंने अपने भीतर से गुलाम रक्त को बूंद–बूंद करके निकाला है, और एक सुबह मैं जागा और पाया कि मेरी नसों में अब गुलाम का नहीं, इंसान का रक्त बह रहा है।” यह उस पत्र का एक वाक्य है जो उन्होंने 1889 में अपने मित्र और प्रकाशक अलेक्सेई सुवोरिन को लिखा था। जाहिर है कि वे बाहरी गुलामी की नहीं मानसिक और नैतिक गुलामी, डर, आत्महीनता, दास-मानसिकता की बात कर रहे थे। चेखोव का परिवार भू–दास पृष्ठभूमि से आया था। उनके दादा ने आज़ादी ‘खरीदी’ थी, लेकिन भीतर बसी दासता, गुलाम चेतना- डर, चापलूसी, झिझक, आत्महीनता, उनसे मुक्ति इतनी आसान नहीं होती। उनकी ‘एक क्लर्क की मौत’, ‘गिरगिट’ और ‘मुखौटा’ जैसी कहानियों का विषय यही आंतरिक गुलामी ही तो है। इस वाक्य में उन्होंने यही कहा था- स्वतंत्रता सिर्फ बाहरी नहीं, आंतरिक भी होती है – और उसे मनुष्य को अपने ही प्रयत्नों से खुद अर्जित करना होता है।
लेकिन सबसे गहन और विराट पाँचवाँ परिचय था जिसका कुछ विस्तार से जिक्र करना चाहूँगा। इससे ही वास्तविक अर्थों में जाना कि अंतोन चेखव नाम के लेखक आत्यंतिक रूप से क्या थे, उनकी बेचैनियां क्या थीं और अपनी कला के प्रति उसका कमिटमेंट क्या था। यह एक पत्र में निर्मल जी ने लिखा था। उन दिनों मेरी नियुक्ति पूर्वी उत्तर-प्रदेश के एक सुदूर गाँव में थी जहां न किताबें थीं, न कोई दोस्त। ऐसी कुछ हताशा मैंने एक पत्र में व्यक्त की। 26.12.90 के इस पत्र में उन्होंने, और बहुत सी बातों के साथ – लिखा – चेखव की सबसे मार्मिक कहानियाँ वे हैं जिनके अनुभव उन्होंने उपेक्षित, गंवई गांवों में डाक्टरी करते या अकाल–पीड़ित लोगों की सेवा करते या सखालिन द्वीप की दुर्गम यात्रा करते हुए भोगे थे, आँखों से देखे थे।
सखालिन रूस का सबसे बड़ा द्वीप है, उत्तर-प्रशांत महासागर में, जापान के ‘होक्काइडो’ के करीब। लगभग पाँच लाख की आबादी वाला यह द्वीप अतीत में रूस और जापान के बीच विवाद का क्षेत्र रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत तक इसका दक्षिणी भाग जापान के नियंत्रण में था, जिसे ‘कराफुतो’ कहा जाता था। अधिकांश आबादी रूसी है, लेकिन एक छोटी कोरियाई आबादी भी है – उन मजदूरों के वंशज जिन्हें जापानी शासनकाल में यहाँ लाया गया था। इसके अलावा यहाँ के मूल निवासी हैं।
आज भी, जब तेज रफ्तार ट्रेनें मौजूद हैं, वहाँ जाना आसान नहीं है। मॉस्को से इस यात्रा में 8-10 दिन लगते हैं। पहले व्लादिवोस्तक 9200 किलोमीटर, फिर ‘वानिनो’ पोर्ट से सखालिन तक ट्रेन-फेरी जो रेल-डिब्बों को भी समुद्र के पार ले जाती है, फिर सखालिन की ट्रेनें । चेखव ने यह यात्रा 1890 में की थी, जब वे 29 साल के थे। वह हमारे देश के ‘काला–पानी’ सरीखा दंड-द्वीप था- जहां अपराधियों और अवांछितों को भेजकर भुला दिया जाता था। चेखव वहाँ कैदियों और निर्वासितों के नारकीय जीवन, वहाँ की क्रूरता और भ्रष्टाचार का प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहते थे। वहाँ कोई सीधी ट्रेन नहीं जाती थी। यह यात्रा उन्होंने ट्रेन, घोड़ागाड़ी, नाव, स्टीमर और समुद्री जहाज़ से पूरी की। पूरी यात्रा में 11 हफ्ते लगे। मैं चाहता हूँ कि आप इस यात्रा के चित्र (visuals) बनाने की कोशिश करें।
कीचड़ भरी सड़कें, साइबेरिया की सर्दी, लंबी बारिशें। कई-कई दिन खराब जगहों पर अटके रहना, कई बार दिन में 100–150 किमी घोड़ागाड़ी से यात्रा। सड़कें टूटी-फूटी थीं और कई जगह थीं ही नहीं, कच्चे धूल-भरे रास्ते थे। लंबे, निर्जन रास्तों पर डाकुओं और भगोड़े कैदियों का डर था। रातों में ऐसी सरायों में ठहरना, जहाँ तरह-तरह के संदिग्ध लोग मौजूद होते थे। घोड़ागाड़ी वाले सुरक्षा के लिए हथियार साथ लेकर चलते थे। बारिश में रास्ते कीचड़ के दलदल में बदल जाते थे। घोड़ागाड़ी बार-बार फँस जाती थी और यात्रियों को उतरकर धक्का लगाना पड़ता था। कई दिन लगातार 12–14 घंटे तक यात्रा करनी पड़ती थी, जो बेहद थकाऊ था। इन सब कठिनाइयों के बीच उनकी तबीयत भी बिगड़ती रही – तेज़ बुखार, अत्यधिक थकान और पुरानी टी.बी…. इसके बावजूद उन्होंने यात्रा बीच में नहीं छोड़ी।
मगर वे वहाँ गए क्यों थे? ऐसी क्या ज़िद थी कि एक 29 साल का खूबसूरत नौजवान, जो एक सफल डॉक्टर था, साहित्य में उनकी एक पुख्ता पहचान थी, तोल्स्तोय जैसे लेखकों का प्यार और संगत उन्हें नसीब थी और उन्हीं दिनों लीडिया से उनका इश्क़ चल रहा था – अपने घर और दोस्तों से दूर, बल्कि उन्हें नाराज़ करके कई हजार किलोमीटर की ऐसी दुर्गम यात्रा पर निकल पड़ा। उन्हें सरकार या किसी ने नहीं भेजा था। वे अपनी इच्छा और अपने खर्च पर गए थे। जब उन्होंने इस यात्रा के बारे में बताया तो कई मित्रों को यह पागलपन लगा। उन्होंने इसका सख्त विरोध किया। टोल्स्तोय ने भी उनके वहाँ जाने का विरोध किया। लेकिन वे अपनी जिद पर अड़े रहे तो उन्होंने जान लिया कि इसके पीछे कोई बहुत गहरी बेचैनी और गहरा उद्देश्य था। ऊपरी तौर पर इसके पीछे मानवीय जिज्ञासा, सामाजिक चिंता और वैज्ञानिक अध्ययन की इच्छा थी – लेकिन अपने भीतर वे अनेक सवालों के जवाब ढूँढने जा रहे थे। कुछ समय पहले उनके भाई की मृत्यु हुई थी। वे बीमारी से जूझ रहे थे। वे, जैसा उन्होंने कहीं लिखा भी, ‘नरक’ में उतरकर वहाँ के दृश्य, जिंदगी का कठिन और नारकीय पक्ष सीधे देखना चाहते थे। उन्हें लगता था कि वे केवल हल्की-फुल्की व्यंग्यात्मक कहानियाँ लिख रहे हैं और अपने लेखन को अधिक गंभीर धरातल पर ले जाना चाहते थे, पूरी नैतिक ज़िम्मेदारी के साथ कल्पना से नहीं, यथार्थ से लिखना चाहते थे।
उन्होंने द्वीप के लगभग सभी निवासियों का साक्षात्कार किया और लगभग 10,000 इंडेक्स-कार्ड भरकर एक ‘डाटा-बेस’ तैयार किया। सिफलिस, टी.बी. और स्कर्वी जैसी बीमारियों का मेडिकल डॉक्युमेंटेशन किया। वहाँ स्वास्थ्य सेवाएँ अत्यंत दयनीय थीं – दवाइयाँ पुरानी, उपकरण टूटे हुए और घावों को गंदे कपड़ों से बाँधा जाता था। उन्होने कैदियों के अलावा पूरे द्वीप में घूमते, गाँव-गाँव जाते हुए गरीबों का मुफ्त इलाज किया। सबसे बड़ा धक्का उन्हें कैदियों के परिवारों की हालत देखकर लगा। कैदियों की पत्नियाँ और बच्चे भी कैदी बने हुए थे। कई महिलाएँ वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर थीं। कई कैदी इतने सालों से वहाँ रह रहे थे, सज़ा पूरी होने के बाद भी- कि वे आधी आज़ादी, आधी कैद जैसी जिंदगी जीते थे। कुछ खेती करते थे, कुछ छोटी दुकानें चलाते थे, लेकिन द्वीप नहीं छोड़ सकते थे। पूरा द्वीप ही एक तरह का खुला कारागार था। इन्हीं अनुभवों से उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सखालिन आइलैंड’ का जन्म हुआ, जिसका एक साहित्यिक महत्व है लेकिन उसके साथ वह समाजशास्त्र और मानव-अध्ययन की एक महान कृति है। यह ज़ारकालीन दंड-प्रणाली का भयावह चित्र प्रस्तुत करती है। रूसी समाज पर इसका गहरा असर हुआ। इसने वहाँ की अमानवीय परिस्थितियों की ओर समाज और सरकार का ध्यान खींचा, जिसके बाद दंड-व्यवस्था पर जाँच और सुधार की चर्चा शुरू हुई। उन्होंने लिखा कि यह स्थान ‘मानव गरिमा के सबसे दुखद पतन’ के दृश्य दिखाता है।
वापसी यात्रा भी लगभग दो महीने चली। वे साइबेरिया के रास्ते से नहीं, समुद्री मार्ग से एशिया के कई बंदरगाह -हाँगकाँग, सिंगापुर और कोलंबो- होते हुए वापस लौटे। एशिया के शहरों ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। उन्होंने लिखा कि इन शहरों की ऊर्जा रूस के कई शहरों से कहीं अधिक दिखाई देती है। कोलंबो ने भी उन पर गहरा प्रभाव डाला। वहाँ की हरियाली, मसालों की खुशबू और उष्णकटिबंधीय प्रकृति का उन्होंने बहुत सुंदर वर्णन किया। यह दृश्य साइबेरिया की कठोर और हमेशा बर्फ से ढकी हुई उदास भूमि से बिल्कुल अलग था।
सखालिन यात्रा ने उन्हें पूरी तरह बदल दिया। उनकी बाद की रचनाओं – जैसे ‘वार्ड न. 6’ और ‘चेरी का बगीचा’ में समाज और मानवीय पीड़ा की जो गहरी समझ है, कहीं-न-कहीं सखालिन के अनुभवों से ही आई। वहाँ उन्होंने कई विचित्र, मानवीय और दिल हिलाने वाले प्रसंग देखे। कैदी उन्हें दोस्त और आत्मीय समझते थे और अपनी जीवनगाथा और अपने अपराध की कहानियाँ सुनाते थे। बहुत सारे निर्दोष थे और बहुतों ने स्वेच्छा से अपने करीबियों के अपराध अपने ऊपर ले लिए थे। चेखव ने जाना कि अपराध सिर्फ अपराधी का निजी नैतिक पतन नहीं होता; उसके पीछे गरीबी, अन्याय, सामाजिक हालात जैसे सैकड़ों कारण होते हैं। अपराध किसी एक शख्स की नहीं, पूरे समाज की नैतिक विफलता होता है।
यह यात्रा उनके जीवन की एक केंद्रीय और निर्णायक घटना बनी। यहाँ दोस्तोएव्स्की की याद आना स्वाभाविक है। वे भी साइबेरिया गए थे, लेकिन बिल्कुल अलग हालात में। दोनों यात्राएँ रूसी साहित्य के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण हैं, पर उनके कारण और अनुभव अलग थे। 1849 में दोस्तोयेव्स्की को ज़ार ने गिरफ्तार कर लिया था। वे एक बौद्धिक समूह, ‘पेत्राशेवस्की सर्कल’, से जुड़े थे जहाँ ज़ारशाही और समाज के बारे में आलोचनात्मक विचार व्यक्त किए जाते थे। उन्हें मृत्युदंड दिया गया, लेकिन फाँसी से ठीक पहले सज़ा बदलकर साइबेरिया में कठोर कारावास कर दिया गया। उन्होंने वहाँ चार साल बिताए। बाद में उन अनुभवों के आधार पर उन्होंने ‘द हाउस ऑफ द डैड’ लिखी। इसके उलट, चेखव को कोई सज़ा नहीं मिली थी। वे स्वेच्छा से और अपने खर्च पर वहाँ गए थे। लेकिन उनकी यात्रा का महत्व इससे कम नहीं होता। दोस्तोएव्स्की को सज़ा न होती तो शायद वे वहाँ कभी न जाते। चेखव अपनी इच्छा से और वास्तव में साइबेरिया से भी बहुत आगे गए थे। यह उस समय किसी भी लेखक की सबसे लंबी और कठिन यात्रा थी। बेशक दोनों में यह फर्क है, जो किसी भी तरह मामूली नहीं है- कि दोस्तोयेव्स्की ने उस दुनिया को भीतर से देखा था, जबकि चेखव ने एक डॉक्टर और शोधकर्ता की दृष्टि से बाहर से। ‘भोगने’ और ‘देखने’ में जो फर्क होता है, वह तो अपनी जगह था ही। दोस्तोएव्स्की के लिए जो उनका निजी अनुभव था, चेखव के लिए वह एक सामाजिक यथार्थ था। इसीलिए एक के यहाँ ‘आत्मिक विस्फोट’ है और दूसरे के यहाँ ‘शांत करुणा’ । एक के यहाँ आत्मा आग में जलती है, दूसरे के यहाँ जैसे धीरे–धीरे ठंडी होती है। दोस्तोएव्स्की के लिए साइबेरिया की सज़ा एक गहरा अस्तित्वगत झटका थी जिसने उन्हें और उनके साहित्य को पूरी तरह बदल दिया। पहले वे भी व्यंग्य, सामाजिक कॉमेडी, हल्की कहानियाँ लिखते थे लेकिन अब उनकी रचनाओं में आने लगी गहरी मनोवैज्ञानिक पड़ताल, अपराध, पाप, ग्लानि, नैतिकता, प्रायश्चित, आध्यात्मिक और अस्तित्व के सवाल। चेखव में भी इस यात्रा के बाद मानवीय करुणा और सामाजिक यथार्थ की समझ और गहरी हुई। उनकी कहानियों में उदासी गहरी हो गयी, अन्याय का बोध अधिक तीखा हुआ, सामाजिक संरचना की क्रूरता साफ और करुणा अधिक परिपक्व दिखाई देने लगी। पहले वे एक व्यंग्यात्मक ‘पर्यवेक्षक’ थे, लेकिन अब वे इंसान की पीड़ा के एक ‘गवाह’ बने । अब उनकी कहानियों में सिर्फ ऊब नहीं, पीड़ा और अन्याय की पहचान और सत्ता और हिंसा का यथार्थ सामने आने लगा। जैसे ‘वार्ड नंबर 6’ में मानसिक अस्पताल केवल अस्पताल नहीं, पूरी व्यवस्था का रूपक है। यहाँ व्यवस्था की निर्ममता और नैतिक सुन्नता का चित्र मिलता है। यह गहराई सखालिन के अनुभव के बिना संभव नहीं थी।
कुछ चर्चा उनकी कहानियों के सौंदर्यशास्त्र पर। उन्होंने कहानी में क्या नया जोड़ा। उन्होंने साहित्य को ‘धीमे स्वर की गहराई’ दी। साधारण जीवन की असाधारणता दिखाई। बताया कि महान साहित्य के लिए बड़े नायक या असाधारण घटनाएँ ज़रूरी नहीं हैं। उनके पात्र बहुत मामूली हैं- डॉक्टर, टीचर, क्लर्क, छोटे जमींदार, साधारण घरेलू स्त्रियां । कहानियों में कोई बड़ी घटना नहीं होती, लेकिन इंसान के भीतर बहुत कुछ घटता है। मनुष्य का आंतरिक जीवन ही सबसे बड़ा नाटक है। वे मानते थे कि लेखक का काम उपदेश देना नहीं, जीवन को दिखाना है। उसे जज नहीं, एक गवाह होना चाहिए – जो ईमानदारी से जीवन वैसा ही दिखाए जैसा वह है। कहानियों का ‘खुला अंत’ जो आज हमें सामान्य लगता है, चेखव की ही देन है। ज़िंदगी की तरह उनकी कहानियाँ भी कभी-कभी अधूरी-सी महसूस होती हैं। उनके नाटकों में भी बाहरी घटनाएँ कम और ‘अंतर्ध्वनि’ अधिक होती है। उनके पात्र जो कहते हैं, उससे अधिक महत्व उस बात का होता है जो वे नहीं कहते। उनकी कथा-तकनीक ‘उप-पाठ’ (subtext) पर टिकी है – यानी वह अर्थ जो सीधे नहीं कहा जाता। ऊपर से सब-कुछ शांत दिखता है, मगर भीतर गहरे तूफ़ान और भूकंप चलते रहते हैं।
पुराने नाटकों में ‘त्रासदी’ का अर्थ होता था: युद्ध, हत्या, आत्महत्या, बड़े संघर्ष। लेकिन चेखव के लिए सबसे बड़ी त्रासदी वह जीवन था जो अपनी पूरी संभावनाओं तक पहुँच ही नहीं सका। वे अपने नाटकों को ‘कॉमेडी’ कहते थे, जबकि वे बेइंतिहा दुखद हैं। इसके पीछे उनकी गहरी कलात्मक दृष्टि थी। मानव-जीवन की विडंबनायेँ उन्हें हास्यास्पद लगती थीं, क्योंकि अधिकतर वे इंसान की अपनी ही गलतियों, भ्रमों और कमजोरियों का नतीजा होती हैं। लोग बड़े-बड़े सपने देखते हैं लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए कुछ नहीं करते। यह स्थिति उन्हें त्रासद से अधिक विडंबनापूर्ण लगती थी।
‘तीन बहनें’ की बहनें हमेशा कहती हैं: “मॉस्को जाना है… मॉस्को जाना है…” लेकिन कभी जाती नहीं। इसी तरह ‘चेरी का बगीचा’ में रानेव्स्काया परिवार की संपत्ति नीलाम होने वाली है। लेकिन परिवार के लोग नयी हकीकत का सामना करने के बजाय पुरानी यादों, अतीत और अपनी क्षुद्रताओं में उलझे रहते हैं। चेखव के लिए यह स्थिति दुखद थी लेकिन साथ ही कुछ हास्यास्पद भी। वे डॉक्टर थे, इसलिए जीवन को बहुत करीब से देख सके थे। उन्हें लगता था कि भीषण दुखों के बीच भी मनुष्य का व्यवहार अक्सर हास्यास्पद होता है। ‘ट्रेजिडी’ के भीतर भी कहीं ‘कॉमेडी’ छिपी होती है। जीवन हमेशा दुतरफा है, एक साथ दुखद और थोड़ा हास्यास्पद। इसलिए वे चाहते थे कि उनके नाटकों को कॉमेडी की तरह पेश किया जाए, जीवन की ही तरह। जब स्तनिस्लावस्की ने ‘चेरी का बगीचा’ का मंचन किया, तो उसे ‘ट्रेजेडी’ की तरह पेश किए जाने पर चेखव नाराज़ हुए और कहा कि उन्होंने तो दरअसल एक ‘कॉमेडी’ लिखी थी।
रूसी साहित्य में तीन बड़े नाम साथ-साथ लिए जाते हैं। टोल्स्तोय बताते हैं कि जीवन कैसे जीना चाहिए, दोस्तोएव्स्की दिखाते हैं कि मनुष्य का ‘भीतर’ कितना जटिल और अँधेरा है, और चेखव चुपचाप दिखाते हैं कि जीवन अक्सर बिना किसी अंतिम निष्कर्ष के चलता रहता है। यही उनकी साहित्यिक शक्ति है – धीमे स्वर में कही गई गहरी मानवीय सच्चाई।
1910–20 के दशक में लीडिया अविलोवा ने अपने संस्मरणों में लिखा कि चेखव उनसे प्रेम करते थे। वे एक-दूसरे से संकेतों और पत्रों के जरिये संवाद करते थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि चेखव के नाटक ‘द सी–गल’ में कुछ प्रसंग उनके और चेखव के संबंध से प्रेरित थे । उन्होंने एक घटना का वर्णन किया है, जिसे उन्होंने चेखव का ‘गुप्त प्रेम-संकेत’ समझा। लीडिया के अनुसार एक बार वे और चेखव रेलवे स्टेशन पर विदा ले रहे थे। बातचीत में चेखव ने अचानक एक अजीब-सा वाक्य कहा: “अगर कभी मैं आपको तार भेजूँ जिसमें लिखा हो – ‘मैं मर रहा हूँ’, तो इसका मतलब होगा कि मैं आपसे प्रेम करता हूँ।” लीडिया के अनुसार यह एक तरह का ‘कोड’ था, क्योंकि वे खुलकर प्रेम व्यक्त नहीं कर सकते थे। कुछ समय बाद वास्तव में चेखव ने उन्हें एक तार भेजा: “मैं मर रहा हूँ।” लीडिया ने इसे उनकी प्रेम-स्वीकृति समझा। लेकिन बाद में पता चला कि चेखव वास्तव में उस समय गंभीर रूप से बीमार थे (उन्हें तपेदिक था), इसलिए यह संदेश शायद शाब्दिक भी हो सकता था।
आलोचक इसे संदेहास्पद मानते हैं क्योंकि चेखव के पत्रों या मित्रों की यादों में ऐसी किसी घटना का जिक्र नहीं है। ये संस्मरण चेखव की मृत्यु के बहुत बाद लिखे गए थे। फिर भी यह प्रसंग बहुत प्रसिद्ध हुआ क्योंकि यह चेखव के नाटकों जैसा ही लगता है। ‘द सी–गल’ और ‘अंकल वान्या’ में भी प्रेम इसी तरह संकेतों, चुप्पियों और गलतफहमियों में छिपा हुआ और अधूरा, अस्पष्ट रहता है।
गोर्की लिखते हैं कि हर किस्म की तुच्छता, क्षुद्रता और ओछापन यानी pettiness उनके सामने आते ही जैसे किसी सख़्त और बेबाक़ जज के सामने खड़े हो जाते थे। और ‘तुच्छता’ ने अपने सबसे बड़े दुश्मन से बदला भी कुछ अजीब और भद्दे ढंग से लिया। वे टीबी का इलाज़ कराने जर्मनी गए थे और वहीं उनका देहांत हुआ। उनका शव जर्मनी से ट्रेन द्वारा मॉस्को भेजा गया, लेकिन जिस रेफ्रिजरेटेड रेल-डिब्बे में शव रखा गया था उस पर लिखा था: Oysters (समुद्री भोजन)। वह डिब्बा सी-फूड ढोने के लिए इस्तेमाल होता था। शव मॉस्को पहुँचा तो एक और गफलत पैदा हुई। उसी समय एक सैन्य अधिकारी की शवयात्रा आ रही थी, सैनिक बैंड के साथ। लोगों का एक ग्रुप गलती से उस शवयात्रा के पीछे चल पड़ा, यह सोचकर कि वह चेखव की है। चेखव की अपनी शवयात्रा बिना किसी राजकीय सम्मान के और काफी शांत और छोटी थी।
गोर्की ने लिखा – वह गंदी, हरी रेलगाड़ी का डिब्बा मुझे ऐसा लगता है जैसे तुच्छता ने अपने थके-हारे दुश्मन पर बड़ी जीत की हँसी हँसी हो। और अख़बारों में छपने वाली अनगिनत ‘स्मृतियों’ और श्रद्धांजलियों में मुझे एक बनावटी दुख दिखाई देता है – जिसके पीछे मैं उसी तुच्छता की ठंडी, बदबूदार साँस महसूस करता हूँ, जो भीतर ही भीतर अपने दुश्मन की इतनी जल्दी मौत पर खुश हो रही है।
ये भी गोर्की के ही शब्द हैं : चेखव की कहानियाँ पढ़ते हुए हमारे सामने तमाम लोगों, चेहरों, अधूरी ख़्वाहिशों की एक अंतहीन कतार गुजरती है। ऐसे लोग जो मोहब्बत के भी क़ैदी हैं, और अपनी नादानियों, आलस्य और लालच के भी। इसके साथ वे दिल के किसी कोने में बैठे एक बेनाम अँधेरे डर के भी बंदी हैं। बहुत-से लोग आने वाले कल की कल्पनाओं में खोकर सुंदर सपने देखते हैं। मगर कोई ठहर कर अपने दिल से यह सादा-सा सवाल नहीं करता – अगर हम सब अपना समय सिर्फ सपने देखने में गँवाते रहेंगे, तो वह सुंदर ज़िंदगी बनाएगा कौन?
इस पूरी बेबस भीड़ के बीच से एक महान, समझदार और चौकन्ना आदमी गुज़रा। उसने अपनी मातृभूमि के थके-हारे, ऊबे हुए लोगों को देखा और एक उदास मुस्कान के साथ – नरम मगर शिकायत भरे स्वर में, चेहरे और दिल में गहरी निराशा लिए, एक साफ़ और सच्ची आवाज़ में कहा – ‘आप लोग बहुत बुरी तरह जी रहे हैं, जनाबो! इस तरह जीना शर्म की बात है।‘
यही है चेखव की आत्मा और उनकी आवाज़।
(29.03.2026 को एक साहित्यिक गोष्ठी में दिये गए वक्तव्य का संपादित रूप)
***

