आत्मसमाधि
अबाध गति से चला आ रहा है
धरती के रंगमंच पर एक मृत्युदूत
विश्रामशील धरती पर बजने लगा है
मुत्यु का दमामा
देखो काँप रही है आदमी नाम की प्रजाति
काँप रहे हैं प्रतापी राष्ट्र और राजमुकुट
काँप रहे हैं मन्दिर मस्जिद गिर्जे
त्राणकर्ता की राह देखते-देखते
ईश्वर अल्ला और गॉड अवनमित हुए
कोई नहीं जा रहा बद्रीनाथ
केदारनाथ के लिए नहीं कोई तीर्थयात्री
नहीं जा रहा है मक्का की चमक देखने
कोई हाजी
कितना झूठ है जाति धर्म वर्ण का यह परिचय
कितने झूठ हैं राजनीतिक हुंकार,
सज्जित परमाणुस्त्र और शासन के दंड
कितना झूठ है आभिजात्य का अहंकार,
हीरे जड़े अलंकार, बुद्धिजीवी के तीक्ष्ण प्रश्न
और क्लियोपेट्रा का अभिमान
कितना झूठ है सूरज को साथ ले आने का स्वप्न
स्वाधीनता का गान उपनिवेश की ताकत
जैसे झूठ के मकड़जाल में फँसा है भूमंडल
देश महादेश में बज रहा है मृत्युसंगीत
टेम्स-मिसीसीपी, हान-मांगतेज,
जामाबिजी, टिबर और पटर की घाटियों में
आज कब्र के किस्से उछल-उछलकर नाच रहे हैं
अपने ही दो हाथ तैर रहे हैं
अविश्वास की जलराशि में
नहीं कोई आकुल देह जिसे
स्पन्दित देह से प्रियतम पुरुष
बाहों में भर लेना चाहे
अभिन्न बन चुके पुरुष और नारी
अचानक बनाने लगे इकरा की दीवारें
स्वप्नातुर प्रेमी चीख रहा है
तुम वहाँ, मैं यहाँ, जीवन का सपना
और उम्मीद, वे सब कहाँ हैं
ओह।
कैसा विषादमय यह गृह बंदीत्व जीवन
चारों और अपनी काली साँसें छोड़ रहा है
कोरोना कालनाग
दिन की यात्रा और रात का विश्राम
अब एक हो चुके हैं
विद्रोही सेना और गैंडे का सींग चुराने वाले
अब एक हो चुके हैं
हे लाल पताका
किसलिए हमें इस बंध्या समय का तोहफा दिया
तुम्हारे लिए ही विषवाष्प प्रदक्षिणा कर रही है
धरती के इस छोर से उस छोर तक
भूलकर प्राचीन युद्ध, भूलकर प्राचीत प्रतिहिंसा
तुम्हारी आत्मसमाधि में आओ उदित करें
नया सूरज।।
अनुवाद- विनोद रिंगानिया
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Tulika Chetia Yein
An Assamese poet and novelist based in Sibasagar, Assam. She has three collections of poems to her credit. Currently she is the editor of a literary magazine Chiphung, published from Dibrugarh, Assam.

