बिजित गोरा रामसियारी की कविता- बोड़ो (असम)

एसे जायगा 
एसेल’ जायगा, खालि एसेल’ जायगा नांगौ होनना
बुङै बुङैनो नों गावनि थाखाय
सोरगिदिं जायगा आरो न’ लुनानै लाबाय
आरो गोसार होबाय कंकृतजों लुनाय गंसे नोगोरमा
जेराव सुंबुंथि जेबो थं गैया
खालि जुनारफोराल’ बेयाव थावरिनो हायो नोंजों लोगोसे
सुबुंफोरा हाजो आरो जाहार फारसे खारखोनो हमनायसै
बैयावबो बिसोरनि नोजोराव जेबो गोग्लैयाखिसै
ना अखा, ना दै, ना खाथि-खाला दैमा
खालि गोथाङै थोंगोर गसंथानो नोंनि फारसे नायहरदों
गावनि बाहागोनि हाखौ बिनानै
होसिख्रावबाय दंमोन बिफां-लाइफांफोरा
आरो जेराव आं गसंनानै दं
बेयाव आंनि गासै आंगोफोरा
गावबा-गावनि न’नि दर्जा खिरखि फांथेनानै
जोबथा हांफोरखौ साननो हुदा खालामगासिनो।
हिंदी अनुवाद
स्वयं कवि द्वारा
थोड़ी सी और बस थोड़ी सी जगह चाहिए
बोलते बोलते तुम अपने लिए
चारों ओर जगह और घर बना लिया
और फैला दिया कंक्रीट से भरा एक महानगर
जहां आदमी का तो कोई ठिकाना नहीं
सिर्फ जानवर बच सकते हैं तुम्हारे साथ
लोग जंगल और पहाड़ की ओर भागने लग गए
पर वहां भी कुछ नज़र नहीं आया
ना बारिश ना पानी ना कहीं पर भी नदी
सिर्फ़ ज़िन्दा खड़े रहने के लिए तुम्हारे तरफ ताकते
अपने हिस्सों की ज़मीन मांगते हुए
चिल्ला रही थी पेड़ पौधे
और जहां मैं खड़ा हूं
यहां सब मेरे अपने
अपनी अपनी घरों के दरवाजे खिड़कियां बंद किए

आखरी सांसें गिनने का अभ्यास कर रही हैं।

बिजित गोरा रामसियारी (1991)
बोडो कवि और कहानीकार, अनुवादक और चित्रकार हैं। आपकी नौ पुस्तकें प्रकाशित हैं गोरबोनि आरज (कविता संग्रह), रजेनो लिरनाय आंनि लाइजाम (कहानी संग्रह), हर गेजेरनि मोसा (उपन्यास), खोमसि हरनि उनाव (उपन्यास), गोलोम बोथोरनि बन्द’ (अनुदित बाल उपन्यास), रौदाफोरनि हा आरो अरखि (अनुदित कविता संग्रह) और कल्पनाओं की मदिरा (हिंदी अनुवाद कविता संग्रह) अन्य अनुवाद पुस्तक शामिल है। आपको साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार (2017) और डॉ. अंबेडकर साहित्य श्री राष्ट्रीय पुरस्कार (2018, दिल्ली) के प्राप्त हैं।
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