नीलिम कुमार की कविताएँ- असम

  1. नमक

दुःख की तरह
नमक भी सफेद है
झक-झक सफेद

नमक और कुछ नहीं
दुःख ही है।

यह पृथ्वी का तीन भाग पानी
दुनिया के आँसू ही
इसी से बनता है नमक

नमक खाते हैं इसलिए
हमारा खून नमकीन है आँसू नमकीन है
पसीना नमकीन है
यहां तक कि हृदय भी।

हृदय तो है ही दुःखों का भंडार
नमक का भंडार
इसीलिए दिल के रोगियों को
मना होता है नमक खाना।

नमक खाकर ही हम दुःख भोगते हैं
इसीलिए हमारे जीवन का तीन भाग
 दुःख है।

फिर भी नमक सबका प्रिय है
नमक के बिना हमारे पेट में अन्न नहीं जाता।
नमक बिना स्वाद होता है मिथ्या
हमारी जीभ को सबसे ज्यादा पसंद है नमक

कारण अकारण हम नमक खाते हैं
कारण अकारण हम दुःख भोगते हैं
सुख में भी हमारे आँसू नमकीन होते हैं
दुःख में भी हमारे आँसू नमकीन होते हैं।

बच्चे नमक नहीं खाते
उन्हें दूध में खुशियाँ यानी चीनी मिलाकर देनी पड़ती है।

इसके बाद धीरे-धीरे एक दिन
उन्हें भी अच्छा लगने लगता है नमक
तब माँएँ पड़ोसियों के आगे घोषणा करती हैं
उनके बच्चों को दूध अच्छा नहीं लगता
पसंद है केवल नमकीन।

इस तरह बच्चे भी धीरे-धीरे
नमक के शिकार होते हैं,
दुःख के शिकार होते हैं।

पेड़-पौधों को भी नमक पसंद है
नमक पाकर वे बढ़ते हैं
जंगल के जानवर क्या नमक पसंद करते है?
करते होंगे,
लेकिन उन्हें मिलता कहां होगा
कैसे खाते होंगे पता नहीं
लेकिन, पालतू मवेशी
नमक पसंद करते हैं
गृहस्थ उन्हें नमक खिलाकर
अपने दुःख का सहभागी बनाते हैं।

एक दिन नमक ने मुझसे पूछा
हाथी के साथ मेरा क्या संबंध है
जो हाथी के मरने पर मेरे साथ दफनाते हैं उसे?
पूछा-उस ताकतवर जानवर के अंदर भी
कोई दुःख है क्या
जिसे नमक से ढकना पड़ता है?

मैंने कुछ नहीं कहा
नमक को कैसे समझाएँ आदमी का विज्ञान !
नमक भी भावुक है।
जब इनसान नहीं रहेगा तब भी रहेगा नमक
जब दुनिया नहीं रहेगी तब भी रहेगा नमक।
क्योंकि तब ईश्वर आँसू बहाएगा
और आँसू का मतलब ही तो नमक है
नमक बचा रहेगा ईश्वर का आँसू बनकर !!

यह रहस्यमय और गूढ़ नमक
जिसने हमें इतना दिया है, इतना दिया है
जिसने दी है हमें जीवन की अमूल्य संपदा
दुःख का पाठ
जिसने दिया है हमारे जीवन में तैरने को
आँसूओं का एक समुद्र
उस नमक को मेरा नमस्कार
उस नमक को मेरा नमस्कार।

2. कविता संबंधी

पढ़ने के पहले ही कविता गायब हो गयी
आप जो अब पढ़ रहे हैं वे कविता के खो जाने के कुछ चिन्ह हैं।
वहां एक कविता थी यह बताने के लिए
कविता कुछ चीजें छोड़ गयी है ताकि
आप कविता को पहचान सकें
कविता के पहने कपड़ों या चप्पल से!

क्या आपके कपड़े, चप्पल या जूते
आपका परिचय हो सकते हैं? तो फिर कविता के साथ अन्याय क्यों हो?

कविता को भी हमें छोड़ देना होगा
हजारों सालों से कविता को दासी बनाने की
कवि की कोशिशों पर पानी फेरकर कविता पार होती रही है।
कई-कई सपनों के बरामदों से
कभी-कभी एक झलक दिखा जाती कविता को हमने देखा है
कभी पढ़ने से पहले ही गायब होते

और जो अपने आपको कविता का पाठक समझता है।
या जिसने कवि के रूप में कभी सामवेद लिखा था
उन सबके प्रति तिल भर भी आस्था न रखते हुए कविता
गायब हुई है लिखने या पढ़े जाने से पहले, और
किसी आलोचक की बगीची में (हालांकि उनकी अपनी बगीची नहीं होती,
वे दूसरों की बगीचियों में ही घूमते फिरते हैं) वह ठठाकर हँसती है

3. रूबी गुप्ता

जालियाँवाला बाग हत्याकाण्ड जिस दिन घटा था
उस दिन रूबी गुप्ता के अन्तर्वस्त्र नहीं सूखे थे।
पक्की छत पर धूप में तार पर डाले
कपड़े वापस लाते समय रूबी गुप्ता ने उस दिन भी
पाया था कि सभी कपड़े सूख गये हैं
सिर्फ अन्तर्वस्त्र नहीं सूखे।
वह काँप उठी थी-
जिस दिन उसके अन्तर्वस्त्र नहीं सूखते
दुनिया में कहीं न कहीं कोई अनहोनी घटती ही है।
उपन्यास के लम्बे घर में रहने वाली उस
रूबी गुप्ता के बारे में बीच-बीच में सोचता हूँ।
उसके अन्तर्वस्त्र के साथ पृथ्वी की इन आपदाओं
के सम्बन्ध के बारे में कोई नहीं जानता, वह किसी को
बता भी नहीं सकती।
दुनिया के बड़े-बड़े भूकम्प, ज्वालामुखी, सूनामी
और हत्याकाण्डों के दिन रूबी गुप्ता के
अन्तर्वस्त्र सूखे नहीं थे। अन्तर्वस्त्र पहने बिना वह
रह नहीं सकती, और बिना धोये भी!
छुटपन में माँ ने सिखाया था नीचे पहनने वाले कपड़े
कभी बासी मत पहनना।
अब रूबी गुप्ता को एक ही चिन्ता रहती है
अन्तर्वस्त्र सूखे या नहीं! मौसम खराब होने पर
वह इस्त्री कर-कर के अपने अन्तर्वस्त्र सुखाती है।
दुनिया को बचाने का उसका यह अनथक प्रयास।

4. आकाश के खिलाफ एक कविता

आकाश की मत करो परवाह।
आकाश क्या है? आकाश मात्र है एक छलावा।
एक विशाल नीला आकार धारण कर लिया है जिस छलावे ने।
दरअसल शुन्यता का नाम है आकाश,
रिक्त स्थानों का नाम ही आकाश।
आलमीरा के खाचों में, रास्ते में पड़ी
खाली बोतलों के अंदर वो आकाश है। हमारे आने जाने वाले
रास्तों में, घर के कोने में, विस्तर के नीचे वो आकश है।
लेकिन कोई भी उन्हें आकाश नहीं कहता।
हमारे सिर के उपर शुन्यता शुन्यता शुन्यता शुन्यता…
से बने नीले तंबू को ही हम लोग कहते है आकाश।
कितना झूठ एक नजारे का नाम है आकाश।
फिर भी ऐसा लगता है जैसे आकाश पोष रहा है हमारी धरती को!
धूप के लिए हमलोग देखते हैं आकाश की तरफ
जबकि धूप और बरसात का कोई संबंध नहीं है आकाश से !
थक जाने पर, पराजित होने पर हम लोग देखते हैं आकाश की तरफ।
नींद न आने पर बिस्तर से उठकर हम लोग देखते रहते है आकाश की ओर।
मानो आकाश के किसी तारे ने चुरा ली हो हमारी नींद!
इसी तरह अनेकों झूठी कहानियों को जन्म दिया है
आकाश ने हमारे खोपड़ी के अधंकार में।
बार-बार झकझोरा है आकाश ने हमारी भावनाओं को !
कितना झूठ एक चित्राकंन का नाम है आकाश।
लगभग प्रलाप कहा जा सकता है हमारी बातचीत को
जब हम कहते है सिर के ऊपर के आकाश की बाते
किराया घर
मेरे एक कमरे में बैठ
वह पढ़ाई करता है
दूसरे में भोजन करता है
एक में गाना गाता है वह
और एक में सो जाता है
मेरे हृदय के चारों कमरे
किराये पर ले रखे हैं उसने
वह दूसरा कोई और नहीं
दुख है!
एक कविता मर रही हैएक कविता मर रही है
कैसे पीड़ा से तड़प रही है। पहली दो पंक्तियाँ आगे झुक आयी हैं।
बीच का एक छन्द पीड़ा से शिथिल पड़ चुका है।
कुछ शब्दों से खून बह रहा है। कुछ शब्द रेत की मानिन्द सूख गया हैं।
कागज ऐसे मुड़-तुड़ गया है जैसे टुकड़े-टुकड़े हो जाने वाला हो।
धुआँ उठ रहा है और शब्द आग पकड़ चुके हैं।
और कुछ शब्द गहरी नींद से सोये है, जैसे मर चुके हों और
उन्हें कुछ भी महसूस न हुआ हो।
कुछ शब्द भागने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कागज को पार
नहीं कर पा रहे।
खुद को छुरा मार कुछ शब्द इतना खून बहा चुके हैं कि होश में
नही हैं।
अंतिम पंक्ति खून की बारिश में भीग रही है…..

किसने लिखी है ऐसी अभिशप्त कविता?

5. रवीन्द्र संगीत

रवीन्द्र संगीत गाते हुए वह मर गया।
जैसे कि हमारे देश में सभी लोगों के पड़ोसी बंगाली होते हैं
मेरा वह पड़ोसी भी बंगाली ही था।
उसकी औरत बातार गयी थी-कल रविवार है,
आज वह हिलसा मछली ख़रीदेगी और
छोटी-मोटी एक-दो चीजें बिस्कुट, ब्रेड-बटर
और थोड़ा नवद्वीप का दही, पाउडर, सिन्दूर की डिब्बी
बिन्दी और साड़ी के फ़ॉल आदि खरीदने के लिए
उसने पर्स से पैसे निकाले थे।
इस तरह बाहर जाना औरत को अच्छा लगता था
उसे भी अच्छा लगा कि अब रवीन्द्र संगीत में डूब जाऊँगा
दीवार पर दो छिपकलियाँ चल रहीं थीं। वह उन
छिपकलियों को देखते हुए रवीन्द्र संगीत गा रहा था।
रसोईघर के बेसिन के जल से थोड़े अन्तराल से
स्टील के बर्तनों पर पानी की बूँदें टपक रही थीं। उनकी आवाज
भी उसके संगीत के साथ ताल मिला रही थी।
दरवाज़ा बन्द था। विश्वास कीजिए
उसके घर में घुसने के लिए मक्खी बनकर खिड़की के रास्ते से
जाने के अलावा कोई चारा नहीं था।
मुझे भी रवीन्द्र संगीत प्रिय था। पुराने दिनों की बातें
मैं रवीन्द्र संगीत सुनकर ही याद किया करता हूँ।
मैं हारमोनियम की बगल में बैठकर नजदीक से रवीन्द्र संगीत
सुन रहा था। मुझे किसी ने देखा नहीं था। मुझे बुरी तरह कँपाती
हारमोनियम की तरंगों के बीच भी मैं स्थिर बना रहा।
इसी तन्मयता से वह गा रहा था, इतनी
तन्मयता से मैं सुन रहा था, सुन रही थी दोनों छिपकलियाँ…
तभी अचानक वह हाँफने लगा
और पल भर में हारमोनियम पर ही गिर पड़ा
यह मृत्यु थी, मैं समझ गया था। मैं मक्खी आने के
खिड़की के रास्ते से होकर वापस लौट गया। छिपकलियाँ भी
कुछ समझकर उस जगह से चली गयीं
इसके बाद मैंने सोचा थोड़ी देर के बाद उसकी पत्नी आएगी।
दरवाजा खटखटाकर थक जाएगी। रूआँसी होकर
पास-पड़ोसियों को बुलाएगी। लोग दरवाजा तोड़ेगे
झूठमूठ का शोर-शराबा, तोड़-फोड़ इससे तो दरवाजे की सिटकनी
खोल देना ही अच्छा है सोचकर मैंने सिटकनी खोल दी।
पाठक ! भूलें नहीं कि तब मैं मक्खी होते हुए भी वास्तव में
आदमी ही था। मैं अपने घर आकर निर्विकार पड़ोसी बन गया।
लेकिन मुझे ऐसा लगा कि उसकी मृत्यु ने
रवीन्द्र संगीत को और भी तेजस्वी बना दिया है।

6. The Rain Aboard the Bus

Holding out its hand, the rain halts
the bus and boards it in a hurry.
There’s no empty seat, and so
holding onto the railing, the rain
stands in the middle of the bus,
brushing its body unto mine.

The wind, the lighting, or the thunder,
none of the rain’s companions are
on these seats, and the people who are
there, they are complete strangers.

In the jerking of the slow bus,
raindrops and its drip-drop melody
scatters everywhere among the passengers.
Some craning their necks and others
peeking through their co-passengers
gawk at the rain which stand
holding the railing like an excitable young girl.

Slowly, the floor of the bus turns
splashy in the rainwater. Still, no one
utters a word; everyone is silent.
Encouraged, the rain puts a hand
on my shoulder. The papers in my
shirt’s pocket are drenched, so is my shirt,
and the half-written poem among the papers.
Unknowingly, my lips suck in the raindrops
that fall along the ridge of my nose.
Thus, unknowingly, the rain enters me.
There is a tiny, little sky inside me.
The sky notices that it is raining.

When I am completely soaked
outside and inside,
the rain whispers into my ear,
‘You didn’t get wet in the rain, did you?”

7. You are Like a Forest

You are like a forest.

Trees grow inside you. You have
creepers that want to climb to the sky.
A spring flows through your heart. There are
rocks in your heart. The spring sings through
these rocks. The rocks don’t remain rocks
in your heart. Sitting on these rocks, one can
sing the softest song of the world, the longest
song of the world. Once you said, you are green.
The sun, the moon rises to look at you. You are
as ancient as the sun, the moon. You are not a colour,
you are the first green. You love clouds.
You would love to walk on clouds. That’s why rains fall upon you,
sometimes incessantly, sometimes meghmalhar,
meghmalhar, meghmalhar… and sometimes, they
stay away for days at end. That’s when the dry leaves
spread a carpet of crunches and bird song turns t
the strings of sitar. You belong to no one.
You are your own greenery.

You are like a forest. I want to be lost in your green.

8. Home Delivery

translated  by Anindita Kar

Two plates of laughter biryani
two bowls of happiness soup
and a salad of good memories
are these available for home delivery?

We went to watch a play called Emptiness
and have both returned empty.
It’s late in the night
and we’re both glued to chairs of anger,
no one turned on the kitchen burner today.

In case there’s no item of laughter or joy
could you home-deliver grief biryani,
two bowls of sorrow soup
and a salad of forgetfulness?

Could you also pack some
hunger and thirst to go with it?

These poems were originally written in Assamese. Published here are Hindi and English translations by multiple translators.

Nilim Kumar

An Indian poet writing in the Assamese language. He has published 24 collections of poetry, three novels and other prose writings. He has won several prominent awards. His poems have been translated into French, Spanish, German, English, Hindi, Nepali, Marathi, Punjabi, Kashmiri, Bengali, Kannada, Urdu, and Tamil. His poems are taught in Bengaluru University, Guwahati University, Dibrugarh University, Cotton University, Mizoram University, Bodoland University, K. K. Handiqe University, Bhattadev University, Kumar Bhaskar Barma University and Delhi University.

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