‘सांस्कृतिक ऊर्जा’ का वाहक है ‘पिता’

प्रोफेसर नीलिमा पाण्डेय

ज्ञानरंजनज्ञानरंजन हिंदी साहित्य की साठोत्तरी पीढ़ी के प्रमुख कहानीकार हैं। उनकी रचनाएँ पारिवारिक संबंधों की जटिलताओं, पीढ़ीगत द्वंद्व और आधुनिक परिवर्तनों के बीच व्यक्तिगत संघर्ष को सूक्ष्म यथार्थ के साथ चित्रित करती हैं। उनकी कहानी ‘पिता’ (प्रकाशन: 1965, संग्रह ‘फेंस के इधर और उधर’) इन विशेषताओं का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह कहानी एक मध्यवर्गीय शहरी परिवार के माध्यम से पुरानी और नई पीढ़ी के बीच बढ़ती दूरी, स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता तथा समझ की कमी को बिना नाटकीयता के प्रस्तुत करती है।
कहानी एक उमस भरी गर्मी की रात में पुत्र की दृष्टि से घटित होती है। पुत्र रात में घर लौटता है। उसकी पत्नी और बच्चे सो चुके हैं। पिता बाहर चारपाई पर सो रहे हैं, जो गर्मी से परेशान होकर उठ-बैठ रहे हैं, बिल्ली को डाँट रहे हैं, आम चुन रहे हैं और घर की चौकीदारी कर रहे हैं। पुत्र को पिता की दुआरे सोने की  इस जिद पर क्रोध आता है। वह मन ही मन कसमसाता है कि वे आधुनिक सुविधाओं पंखा, शावर, महँगे फल, अच्छी धोती का उपयोग क्यों नहीं करते, जबकि परिवार उन्हें जुटाने में लगा है। कहानी फ्लैशबैक और पुत्र के आत्मालाप के माध्यम से पिता की आदतों, परिवार की चिरौरी और असफलता को दर्शाती है। पूरे कथानक में कोई बड़ा घटनाक्रम नहीं है। कथानक पूर्णतः एक रात की गर्मी, पसीने, सन्नाटे और विचारों की उथल-पुथल में समाया है। कथान्त में पुत्र का विचार प्रवाह असहायता के भाव  पर आकर ठहर जाता है, जो कहानी को मार्मिक बनाता है।

कहानी के उन्वान से साफ़ है कि पिता कहानी के केंद्र में हैं। वे पुरानी पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। बेहद स्वाभिमानी, सादगीपसंद और आत्मनिर्भर। वे आधुनिक सुविधाओं से चिढ़ते हैं, उन्हें फ़िज़ूलख़र्ची मानते हैं, लेकिन परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को लेकर बेहद सजग हैं।

धीरेधीरे सबके लिए सुविधाएँ जुटाते रहेंगे, लेकिन ख़ुद उसमें नहीं या कम से कम शामिल होंगे।” (पृ.16)

यह वाक्य पिता के त्याग और जिद दोनों को उजागर करता है। वे बाहर नहाते हैं, साधारण भोजन पसंद करते हैं, सस्ते में जाने के लिए रिक्शे का घण्टों इंतज़ार करते हैं। प्रथम दृष्टया उनकी यह आदतें जिद्दी और अड़ियल स्वभाव जैसी लगती हैं। साथ ही   इन्हें  पिता का अपनी जड़ों से जुड़ाव और संतोष का प्रतीक भी माना जा सकता है।  ‘पिता’ कहानी में पुत्र कथावाचक या सूत्रधार की भूमिका में है। वह नयी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है। वह पिता से प्यार करता है लेकिन उनकी जिद से त्रस्त है। वह आधुनिक सुविधाओं का महत्व समझता है और सामाजिक मान-अपमान को लेकर भी चिंतित रहता है।

मुहल्ले में हम लोगों का सम्मान हैआपका बाहर चौकीदारों की तरह रात को पहरा देना बड़ा ही भद्दा लगता है (पृ.17)

पुत्र का आंतरिक द्वंद्व  क्रोध और सहानुभूति के मिश्रण सरीखा है। यह कहानी की उसकी मानसिक गहराई प्रदान करता है।
अन्य पात्र पत्नी, बच्चे, दादा भाई वगैरह पृष्ठभूमि में रहकर परिवार की सामूहिक चेतना बनाते हैं। लेखक ने पात्रों को आदर्श या खलनायक नहीं बनाया; वे यथार्थवादी हैं, जिनमें मानवीय कमजोरियाँ और गुण दोनों हैं।

कहानी की भाषा सरल, संवादात्मक और मनोवैज्ञानिक है। लेखक  विस्तृत वर्णनों से वातावरण रचते हैं। गर्मी, पसीना, सन्नाटा, पंखे की चिढ़ाती आवाज, आम गिरने की आवाज़ ‘लद्द-लद्द’ को आप न सिर्फ़ पढ़ते हैं बल्कि सुनते भी हैं।  रचे गए परिदृश्य का यह यथार्थ कहानी को जीवंत बनाता है।

आज बेहद गर्मी है। रास्तेभर उसे जितने लोग मिले, उन सबने उससे गर्म और बेचैन कर देने वाले मौसम की ही बात की। कपड़ों की फ़ज़ीहत हो गई। बदहवासी, चिपचिपाहट और थकान है।” (पृ.15)

कथानक की शैली में आत्मलाप प्रमुख है, जो पुत्र के विचारों की उथल-पुथल दिखाता है। संवाद कम लेकिन प्रभावी हैं। प्रतीकात्मकता सूक्ष्म है। कहानी में गर्मी का बार-बार ज़िक्र है। गर्मी बाहरी और भीतरी तनाव दोनों का प्रतीक है, बाहर सोना अलगाव और त्याग का, आम चुनना सादगी और मेहनत का। कथानक उतार-चढ़ाव विहीन सपाट ज़रूर है लेकिन उसका मनोवैज्ञानिक पक्ष प्रबल है। यह साठोत्तरी कहानी की विशेषता है।

पिता कहानी की रेखांकित किये जाने योग्य विशेषताएं इस प्रकार हैं :
पीढ़ीगत द्वंद्व : पुरानी पीढ़ी की मूल्यों से चिपकी मानसिकता और नई पीढ़ी की आधुनिकता के बीच संघर्ष। पिता आधुनिकता को अनावश्यक मानते हैं, लेकिन पुत्र इसे आवश्यक मानता है।
स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता: पिता का संतोष अपनी मेहनत में है। वह अपना हाथपाँव जानते हैं, अपना अर्जन, और उसी में उन्हें संतोष है। (पृ.17) यह संदेश आज भी प्रासंगिक है कि बाहरी सुख संतोष नहीं देते।
पारिवारिक संबंधों की जटिलता: प्यार है, लेकिन समझ और संवाद की कमी भी है। पुत्र पिता को बदलना चाहता है लेकिन असफल रहता है, जिससे अपराधबोध और दूरी बढ़ती है।
शहरी मध्यवर्ग की विडंबना: सुविधाओं के बावजूद मानसिक तनाव, सामाजिक दिखावा और अलगाव।
समझ और सहानुभूति की आवश्यकता: कहानी निष्कर्ष नहीं देती, लेकिन पुत्र की अंतर्दृष्टि से संकेत मिलता है कि संबंधों में आस्था बनी रहनी चाहिए।

‘पिता’ ज्ञानरंजन की अन्य कहानियों (‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’) की तरह पारिवारिक संबंधों पर केंद्रित है। यह अकहानी आंदोलन के युग में भी यथार्थवादी बनी रही। यह कहानी हमें बताती है कि पीढ़ियाँ बदलती हैं लेकिन संबंधों का आधार पारस्परिक समझ होनी चाहिए।
आलोचनात्मक दृष्टि से इस कहानी में ‘पिता की जिद’ और ‘पिता के त्याग’ के बीच द्वंद्वात्मक स्थिति है। जिद का पैमाना उन्हें रूढ़िवादी और आत्मग्रस्त दर्शाता है जबकि त्याग के नज़रिए से हम उनकी स्थिति को बेहद मार्मिक पाते हैं। समग्र रूप से, यह हिंदी कहानी साहित्य की अमूल्य कृति है, जो पाठक को आत्म-चिंतन के लिए प्रेरित करती है।

कहानी का शुरुआती परिदृश्य आगत का खाका खींच देता है। पुत्र की थकान और घर की चुप्पी पाठक को एक किस्म के उदास आतंक से भींच लेती है।

उसने अपने बिस्तरे का अंदाज़ लेने के लिए मात्र आध पल को बिजली जलाई। बिस्तरे फ़र्श पर बिछे हुए थे। उसकी स्त्री ने सोतेसोते ही बड़बड़ाया, ‘ गए’…” (पृ. 14)

यह शुरुआती वाक्य ही घर की चुप्पी, थकान और आर्थिक स्थिति का संकेत देता है।

इसी तरह पिता की चारपाई की चरमराहट बाहरी दुनिया और आंतरिक संघर्ष के बीच एक दरवाज़ा है।

तभी पिता की चारपाई बाहर चरमराई। वह किसी आहट से उठे होंगे। उन्होंने डाँटकर उस बिल्ली का रोना चुप कराया…”(पृ.15)
यह दृश्य पिता की सतर्कता और अकेलेपन को दर्शाता है।

पुत्र का रोष बढ़ता है जब वह सोचता है कि अंदर सब आराम से सो रहे हैं जबकि पिता बाहर कष्ट भोग रहे हैं।

बड़ा ग़ज़ब हैगजब तो पिता की ज़िद है…” (पृ.16)

यहां लेखक पुत्र की कुंठा और क्षोभ को बखूबी उकेरते हैं।

पिता की आदतों का वर्णन यथा वाश-बेसिन न इस्तेमाल करना, खुले में नहाना, साधारण भोजन आदि पुरानी जीवन शैली के प्रतीक हैं। पिता का इस शैली से जुड़ाव नयी पीढ़ी को अखरता है।

आम चुनने का दृश्य मार्मिक है।

लद्दलद्द, बाहर आम के दो सीकरों के लगभग एक साथ गिरने की आवाज़ आई। वह जानता है, पिता आवाज़ से स्थान साधने की कोशिश करेंगे।” (पृ.17)

यह छोटी-छोटी आदतें पिता को जीवंत बनाती हैं।

कहानी के अंतिम भाग में पुत्र की समझ और सदाशयता बढ़ती है। वह पिता की ‘अद्भुत और विचित्र’ प्रकृति को स्वीकार करता है। उसकी यह स्वीकारोक्ति संबंधों में उदारता का संदेश देती है।

नव इतिहासवादी दृष्टि सेपिता
नव-इतिहासवाद साहित्य को उसके ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संदर्भ में देखता है। यह साहित्य को स्वायत्त कृति नहीं मानता बल्कि उसे समय की सत्ता-संरचनाओं, आर्थिक परिवर्तनों, सामाजिक मानसिकताओं और सांस्कृतिक प्रथाओं का उत्पाद तथा भागीदार मानता है। ज्ञानरंजन की कहानी ‘पिता’ (1965) को नव-इतिहासवादी दृष्टि से पढ़ने पर यह 1960 के दशक के भारत की व्यापक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं स्वतंत्रोत्तर आधुनिकीकरण, शहरी मध्यवर्ग का उदय, पारंपरिक मूल्यों का क्षरण और पूंजीवादी उपभोक्तावाद के प्रारंभिक प्रभाव का सूक्ष्म दस्तावेज बन जाती है।
ऐतिहासिक संदर्भ: कहानी 1960 के दशक की है, जब भारत में पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से औद्योगीकरण, शहरीकरण और मध्यवर्गीय सुविधाओं (बिजली, पंखा, शावर, रिक्शा, आयातित फल आदि) का विस्तार हो रहा था। स्वतंत्रता के बाद की पहली पीढ़ी (पिता) औपनिवेशिक-पूर्व स्वदेशी और सादगी की नैतिकता से बंधी थी, जबकि उनकी संतान (पुत्र) नयी पूंजीवादी आकांक्षाओं और आधुनिक उपभोग संस्कृति की ओर अग्रसर थी।
सत्ता और प्रतिरोध का द्वंद्व: पिता का चरित्र पारंपरिक पितृसत्ता का प्रतीक है, जो आर्थिक रूप से परिवार के लिए सुविधाएँ जुटाता है लेकिन स्वयं उनसे दूर रहकर अपनी सांस्कृतिक स्वायत्तता बनाए रखता है।

यह प्रतिरोध उपनिवेशवादोत्तर भारत में ‘स्वदेशी’ और ‘सादगी’ की बची-खुची नैतिकता का हिस्सा है, जो पूंजीवादी उपभोक्तावाद के सामने टिक नहीं पा रही थी।
शरीर, स्थान और वर्गचेतनापिता का बाहर सोना, खुले में नहाना, आम चुनना और वाश-बेसिन से दूर रहना केवल व्यक्तिगत जिद नहीं, बल्कि शरीर पर सांस्कृतिक नियंत्रण का मुद्दा है। आधुनिकता निजी स्थान और आरामदायक शरीर की मांग करती है, जबकि पिता सार्वजनिक/खुले स्थान और कठोर शरीर को बनाए रखकर अपनी ‘प्रामाणिकता’ का दावा करते हैं।

आज तक किसी ने पिता को वाशबेसिन में मुँहहाथ धोते नहीं देखा। बाहर जाकर बगियावाले नल पर ही कुल्लादातुन करते हैं।”(पृ.16)

यह दृश्य 1960 के दशक के शहरी मध्यवर्ग में हो रहे ‘सिविलाइजिंग प्रोसेस’ का प्रतिरोध दर्शाता है। पुत्र की दृष्टि में यह ‘भद्दा’ लगता है क्योंकि वह मुहल्ले की नज़र और मध्यवर्गीय प्रतिष्ठा से चिंतित है।
पीढ़ीगत द्वंद्व को ऐतिहासिक बनाना: पिता स्वतंत्रता-संग्राम या पूर्व-स्वतंत्र काल की कठिनाइयों की स्मृति लेकर आए हैं, जबकि पुत्र स्वतंत्र भारत की नई संभावनाओं में बड़ा हुआ है। गर्मी का प्रतीक यहां ऐतिहासिक उमस का प्रतीक है जिसमें पुरानी और नई मूल्य-व्यवस्थाएँ टकरा रही थीं।
समकालीन प्रासंगिकता: नव-इतिहासवादी दृष्टि से ‘पिता’ हमें याद दिलाती है कि साहित्य केवल व्यक्तिगत कहानी नहीं, बल्कि उस युग की ‘सांस्कृतिक ऊर्जा’ का वाहक है।

वस्तुतः ज्ञानरंजन की ‘पिता’ एक कालजयी कहानी है जो आज भी प्रासंगिक है। आधुनिक भारत में पीढ़ीगत अंतर, बुजुर्गों की उपेक्षा और परिवार की जिम्मेदारियाँ चुनौती बनी हुई हैं। कहानी हमें सिखाती है कि संबंधों में बदलाव स्वीकार करते हुए भी एक-दूसरे की मानसिकता और मनःस्थिति समझनी चाहिए। लेखक ने बिना नैतिक दबाव बनाए यथार्थ प्रस्तुत किया है। भाषा की सरलता, मनोविश्लेषण की गहराई और प्रतीकों की सूक्ष्मता इसे श्रेष्ठ बनाती है। पाठक इस कहानी को पढ़कर स्वयं से पूछता है कि ‘क्या हम अपने पिताओं को समझ पा रहे हैं?’

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नीलिमा पांडेय
प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

लेखक: ज्ञानरंजन
पुस्तक: प्रतिनिधि कहानियां
प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन

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