सुरेन्द्र मनन

काल : वर्तमान
स्थान: बोट–की
समय: दिन, तीसरा पहर
स्टेमफोर्ड रेफल्स कल-कल बहती हुई नदी के साथ बने संगमरमरी चबूतरे पर छाती ताने, विजेता की मुद्रा में अकड़कर खड़ा है. उसके सफाचट चेहरे पर दर्प की मुस्कान है, आपस में जुड़ती हुई घनी भवों को लंबी, ऊँची उठी नाक संतुलित किए हुए है, लंबे बालों के कुंडल गर्दन पर लहरा रहे हैं, दोनों बाजू शान से छाती पर बंधी हैं और लंबा सफेद कोट हवा में फरफरा रहा है. वह चुस्त पैंट और घुटनों तक ऊँचे सफेद बूट पहने है और उसका दायाँ पैर आगे बढ़ कर इस तरह ठिठका हुआ है जैसे किसी नए अभियान पर जाने की तैयारी में हो… और नदी के उस पार, पानी की एक संगमरमरी चौहद्दी के बीच बेबस-सा खड़ा सफेद-शुभ्र मरलॉयन – आधा सिंह, आधा मीन – अपनी गर्जना भूल कर अवाक रेफल्स को ताक रहा है.
नदी किनारे के खुले-चौड़े रास्ते पर एक चीनी चित्रकार अपना कैनवस जमीन पर टिकाए रंग-बिरंगी कूचियों से नदी, नदी में बहती नाव, नदी पर बने अर्धगोलाकार पुल, पुल पर आलिंगनबद्ध एक युवक-युवती, रेफल्स, मरलॉयन और पृष्ठभूमि की गगनचुंबी इमारतों का चित्र बना रहा है. बनते हुए चित्र में नदी का पानी स्थिर है, बहती हुई नाव स्थिर है, आते-जाते लोग भी स्थिर हैं…
हम शॉट लेने के लिए तैयार हैं. फ्रेम के अग्रभाग में चित्रकार और बनाई जा रही पेंटिंग है और पृष्ठभूमि में बहती हुई नदी, पुल, स्टेमफोर्ड मरलॉयन और गगनचुंबी इमारतों की कतार है. इस क्म्पोज़ीशन में नदी स्थिर भी है और बह भी रही है. लहरों पर नाव ठिठकी हुई है और डोलती हुई आगे भी बढ़ रही है. आलिंगनबद्ध युवक-युवती मूक हैं और खिलखिला भी रहे हैं. नदी के दोनों किनारों की खुली जगह पर लोग विभिन्न मुद्राओं में अटके हुए भी हैं और शाम की ठंडी हवा का सुख लेते हुए चहलकदमी भी कर रहे हैं, पब्स में बियर पी रहे हैं, परिचितों से मिलते हुए ठहाके लगा रहे हैं. भव्य मॉल्स, रेस्तराओं, व्यावसायिक केंद्रों में रोजमर्रा की भागमभाग है.
सिंगापुर की सूरत और सीरत कमोबेश ऐसी ही है. सेंटोसा के समुद्र तट, ‘इमेज ऑफ सिंगापुर’ के गलियारों, एशियन सिविलाईज़ेशन संग्रहालय की वीथियों में ठहरी-ठिठकी और आचर्ड रोड, ऐल्बर्ट मॉल, एसप्लेनेड, तैंगलिन मॉल जैसी जगहों पर बेसब्री से उफनती-मचलती, निरंतर अधीर-अशांत. यह सीरत तुरंत अपनी गिरफ्त में ले लेती है, मैदान में कूद पड़ने को ललकारती है, खुलकर दाँव लगाने को उकसाती है.
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कहते हैं सिंगापुर कभी सोता नहीं. इतना ही नहीं, सिंगापुर सोने भी नहीं देता. सिंगापुर का दर्शन है – जो सोता है, वो खोता है. और उसका नारा है – जागते रहो और खरीदते रहो. खरीदो, खरीदो, और खरीदो ! इतना नहीं, और अधिक उपभोग करो. उपभोग करने की अपनी सीमाओं को तोड़ो, इन सीमाओं से बाहर आओ . सिर्फ यह नहीं, यह भी, और यह भी लो. खरीदारी का बुख़ार हो जैसे. जूड़ी में काँप रहा हो सिंगापुर. ठसाठस भरे शॉपिंग सेंटर, मेगा-मॉल्स, कुकरमुत्तों की तरह दुकानें ही दुकानें, जगह-जगह, हर जगह. पैसा दो, सामान लो. सामान दो, पैसा लो. कुछ और मत सोचो-करो. सिर्फ खरीदो और बेचो. रात-दिन. दिन-रात. समय की कोई सीमा नहीं, कोई सुस्ताहत, कोई थकान नहीं. निरंतर सामान उगलती दुकानें, कभी न थकने वाले ग्राहक. यह सामान की लूट है या ज़रूरतों का हाहाकार – भेद कर पाना मुश्किल है. अफसोस कि दिन-रात के सिर्फ चौबीस घंटे हैं. काउंटरों पर, मशीनों पर बैठे कर्मचारियों को आँख उठाने की भी फुर्सत नहीं. उनकी आँखें और कान उनके हाथों में समाए हैं. सब इंद्रियाँ हाथों की खट खट खट खट चलती उँगलियों में सिमट आई हैं. यह ‘रेस अगेन्स्ट टाइम’ है. यूरो, डॉलर, पाउंड, भाट, रिंगिट, रुपया…जो भी है, ले आओ. सब कुछ ले आओ. लेते आओ. उँगलियाँ गिनती करते हुए रुकती नहीं. गिनते-गिनते शिथिल होने लगती हैं तो तुरंत दूसरे हाथ उनकी जगह तैनात हो जाते हैं. उँगलियाँ चटकाते. फर्र-फर्र गिनती गिनते. गोरे-भूरे-पीले-काले… हर क़िस्म के हाथ. लपलपाते, बेचैन, हड़बड़ाए, सधे हाथ.
काल: वर्तमान
स्थान: सैयद अल्वी रोड
समय: रात, दो बजे
रौशनियों से जगमगाती चौड़ी सड़क पर दिन जैसी चहल-पहल है. शॉपिंग-मॉल के लंबे गलियारे में इस सिरे से उस सिरे तक मेज-कुर्सियाँ लगी हैं. गलियारे की तरफ खुलती दुकान में तेज संगीत गूंज रहा है. अंदर कर्मचारियों की भागमभाग है. काउंटर पर खड़े दो व्यक्ति बेहद व्यस्त हैं. एक ऑर्डर ले रहा है, दूसरा सर्व कर रहा है. युवक-युवतियाँ, अधेड़, बूढ़े कॉफ़ी, कोल्ड-ड्रिंक्स, सनैक्स खा-पी रहे हैं, बातचीत में मशगूल हैं, ठहाके लगा रहे हैं.
गलियारे के कोने पर बने मुद्रा-विनियम स्टॉल के बाहर भारतीय, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी टोलियों में जोशो-खरोश से बातचीत हो रही है. कुछ यूरोपीय सैलानी बोर्ड पर लिखे मुद्रा-विनियम के ताजा भाव बड़ी तन्मयता से निहार रहे हैं. काउंटर पर करंसी की अदला-बदली हो रही हैं. मुस्तफा सेंटर से कई जोशीले लोग खरीदे हुए सामान के बड़े-बड़े पैकेट उठाए बाहर निकल रहे हैं. अंदर ग्राहकों की कभी न पूरी होने वाली माँग को पूरा करने की कोशिश में
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सैंकड़ों कर्मचारी शिफ़्टों में काम कर रहे हैं.
उपभोक्ता संस्कृति जिसे कहा जाता है, सिंगापुर उस अवधारणा का मूर्त, दुर्दमनीय और प्रचंड रूप है. बाज़ारवाद की धुन के अखंड कीर्तन में मगन. माँग-पूर्ति की कशमकश और इस उलझे हुए गणित के पेंचों से खेलता-खिलखिलाता और ठहाके लगाता हुआ सिंगापुर.
दरअसल इस बात का श्रेय स्टेमफोर्ड रेफल्स को जाता है कि उसने एक प्रतिभास के संभावित दैत्याकार रूप को तभी पहचान लिया, जब यह सिंगापुर देश नहीं, सिंहपुरा नाम का एक द्वीप था. रेफल्स ने भविष्य में बनने वाले इस समाज का पूर्वानुमान तभी कर लिया था. जगह-जगह, दूर-दराज तक बिखरे और तेजी से पनप रहे इसके अंकुरों को समेट कर, उन्हें माफिक हवा-पानी देकर द्रुत गति से बढ़ने-फैलने देने और देखते-देखते घने-उलझे जंगल में फलीभूत कर देने का सेहरा भी रेफल्स के सिर पर ही है. रेफल्स को यह गौरव भी प्राप्त है कि उसने एक प्रतिभास को एक राष्ट्र की शक्ल में रूपांतरित कर डाला और दुनिया को दिखाया कि खरीद-फरोख्त की संस्कृति को आधार बना कर भी एक देश का निर्माण किया जा सकता है. वह कोई जादूगर नहीं था, जिसने एक गाँव में से शांत, मंथर गति से गुजरती हुई नदी में से अजूबे की तरह एक देश निकाल कर खड़ा कर दिया. वह ऐसा भविष्यद्रष्टा था, जिसने लगभग दो सौ साल पहले जमीन पर मचलती पानी की इस लकीर का इस्तेमाल उस भ्रूण को सींचने-पल्लवित करने के लिए किया, जिसे भविष्य का मानव-समाज बनना था. जिसे सिंगपुरा से सिंगापुर बनना था.
तब यह द्वीप सिंहपुरा के नाम से ही जाना जाता था. उससे भी पहले, प्राचीन काल में तनसेक नाम से. तनसेक, यानी समंदर के किनारे बसा नगर. तेरहवीं सदी में श्रीविजय साम्राज्य का एक राजकुमार जब इस द्वीप पर पहुँचा, तो जंगल में उसे एक मायावी रूप दिखाई दिया जो आधा सिंह था और आधा मीन. राजकुमार ने द्वीप को सिंहपुरा नाम दे दिया. तभी से सिंह इस हरे-भरे, प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर और रमणीय द्वीप का प्रतीक-चिन्ह बन गया. मायावी सिंह दूर-दूर तक फैले जंगलों में निर्भय विचरता था. गाँववासियों को उसकी झलक तब मिलती, जब नदी के चौड़े पाट पर वह पानी पीने आता. वे सब करबद्ध खड़े दूर से उसे देखते, अपनी सुख-समृधि और द्वीप की खुशहाली के लिए उससे प्रार्थना करते. उनका विश्वास था कि आधा सिंह, आधा मीन वाली उस मायावी शक्ति के रहते उन पर कोई विपदा नहीं आएगी. बाहर की दुनिया से अपरिचित, ये गाँववासी प्रकृति के अंचल में निश्छल, निश्चिंत जीवन बिताते थे.
काल: सन 1819
स्थान: सिंहपुरा द्वीप
समय: सुबह
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हरे-भरे घने जंगल में बलखाती हुई नदी बह रही है. नदी के किनारे बसा एक छोटा-सा गाँव है. पेड़ों पर पक्षियों का कलरव, इधर-उधर भागते-दौड़ते बच्चों की खिलखिलाहट, नदी
में नाव खेने की छपाक-छपाक. मछुआरे पानी में जाल डाले नदी किनारे बैठे हैं. महिलाएँ पानी के बर्तन भर कर पगडंडी पर चली जा रही हैं. झुरमुट में कहीं युवतियों की हँसी-ठिठोली की आवाजें गूंज रही हैं.
ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए एक नए उपनिवेश की तलाश में निकला स्टेमफोर्ड रेफल्स इंडियाना जहाज पर सफर करता हुआ इस द्वीप पर पहुँचता है. नदी के साथ-साथ चहलकदमी करता हुआ वह गाँव का रुख करता है. नदी में उछल-कूद मचा रहे बच्चों का खेल रुक जाता है. वे हैरानी से रेफल्स को ताकते हैं. खुसफुस करते हुए कुछ कदम उसके पीछे-पीछे चलते हैं, फिर खबर देने के लिए घरों की ओर दौड़ पड़ते हैं. बड़े-बूढ़े बाहर निकल कर आशंका और भय के भाव से रेफल्स को आता हुआ देखते हैं. रेफल्स गाँव से गुजरता हुआ, सबकी ओर रस्मी मुस्कान फेंकते हुए पहाड़ी की ओर चल देता है. पहाड़ी पर चढ़ कर वह दूर-दूर तक बलखाती, बहती हुई नदी के चमचमाते पानी को देखता है, समुद्र से उसके संधिस्थल और आस-पास फैले जंगल का जायज़ा लेता है. कुछ देर बाद वह नीचे उतर कर नदी के किनारे सुस्ताने बैठ जाता है. उसकी तीक्ष्ण दृष्टि नदी के एक ख़ास हिस्से पर टिकी है. पानी के बहाव को देखता हुआ वह पानी की गहराई का अंदाज़ा लगाता है, फिर उसकी नजर दूर लंगर डाले इंडियाना जहाज पर फहराते पोतध्वज पर टिक जाती है…
अचानक पेड़ों पर चहचहाते पक्षी फुर्र-फुर्र उड़ जाते हैं. मवेशी बेसुरी आवाज़ों में रंभाने लगते हैं. मछुआरे अपने-अपने जाल समेट कर बदहवासी में भाग खड़े होते हैं. भयभीत महिलाएँ बच्चों को लेकर घरों में दुबक जाती हैं.पेड़ कट-कट कर गिर रहे हैं. जंगल नंगा हो रहा है. सिंहपुरा का प्रतीक, मायावी मरलॉयन इस दिशा से उस दिशा में सरपट भागता हुआ कहीं लुप्त हो जाता है ! …समूचा परिदृश्य बदल चुका है. अनावृत हो चुकी नदी के आसपास ऐसी आवाजें उठने लगी हैं, जिन्हें गाँव वालों ने पहले कभी नहीं सुना. इन मिली-जुली आवाजों का स्वराघात निरंतर ऊँचा उठता जाता है. शांत बहने वाली नदी की धारा मानो विक्षिप्त होकर उछल-कूद मचाने लगी है… और रेफल्स किनारे पर खड़ा बड़े गर्व नदी में इधर से उधर भाग रही नावों, आते-जाते स्टीमरों और माल से भरे जहाज़ों को देख रहा है. जहाज माल लादे आ रहे हैं, खाली हो रहे हैं और फिर से लदे हुए वापिस जा रहे हैं. सैंकड़ों मजदूर माल की लदाई-उतराई में जी-जान से जुटे हुए हैं.
इस द्वीप का यह आश्चर्यजनक रूपांतरण उस संधि के बाद हुआ, जो रेफल्स ने सुलतान हुसैन शाह के साथ सन 1819 में की थी. संधि की शर्तों के अनुसार ब्रिटिशों को इस द्वीप पर एक व्यापारिक चौकी स्थापित करने का अधिकार मिल गया था. चौकी स्थापित करने के बाद सिंहपुरा को मुक्त बंदरगाह घोषित कर दिया गया. रेफल्स की दूरगामी योजना का यह एक
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महत्वपूर्ण पहलू था. उसका मकसद इस द्वीप को सिर्फ एक व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित करना नहीं, बल्कि पूर्व-पश्चिम के व्यापार पर डचों के एकाधिकार में सेंध लगाना भी था. मुक्त बंदरगाह का बनना सिंहपुरा के इतिहास का वर्तन बिंदु साबित हुआ.
व्यापारिक चौकी स्थापित करने के कुछ वर्ष बाद रेफल्स जब सिंहपुरा लौटा, तो अपनी करामात का अंजाम देखकर खुद ही दंग रह गया. सिंहपुरा, सिंगापुर में बदल चुका था. सारी दुनिया मानो सिंगापुर पर टूट पड़ी हो. नदी किनारे अनेक व्यापारिक कंपनियों के दफ़्तर खुले हुए थे. यूरोपीय, यहूदी, अरब, चीनी, भारतीय व्यापारियों के साथ-साथ हर नस्ल के मजदूरों का सैलाब उमड़ रहा था. लोगों के हुजूम के हुजूम गलियों, बाजारों में उफन रहे थे. जंगल साफ हो चुका था और हर तरफ झोंपड़ों, बैरकों की ऊबड़-खाबड़ क़तारें थीं. दूर-दूर तक मजदूरों की बस्तियाँ बस चुकी थीं.
काल: सन 1830
स्थान: सिंगापुर नदी
समय: दिन, दूसरा पहर
नदी के मटमैले पानी में बेतहाशा नाचते हुए अनगिनत चप्पू. छपाक छपाक छपाक… नावें इधर से उधर भाग रही हैं. सिर पर बांस की खपच्चियों की गोलाकार टोपियाँ लगाए चीनी मजदूर लदी हुई नावों से माल उतार रहे हैं. ठेलों पर ढो-ढो कर माल गोदामों तक पहुँचा रहे हैं. बाजारों में बोलियाँ लग रही हैं. दलाल मालामाल हो रहे हैं. गोदाम भर रहे हैं और देखते-देखते खाली हो रहे हैं. इंग्लैंड से आया चतुर व्यापारी एलेग्ज़ेडर, बाजार पर काबिज होने की हरसंभव चाल चल रहा है तो मद्रास का नारायण पिल्लै भी दाँव खेलने में अनाड़ी नहीं. उसके कारिंदे बाजार-भाव की खबर पल-पल उस तक पहुँचा रहे हैं. दक्षिणी चीन के ली-फैंग ने भी अपने बाल धूप में सफेद नहीं किए. शरारत भरी मुस्कान लिए वह ऐसा पाँसा फेंकता है कि बाजार-भाव में खलबली मच जाती है. प्रतिस्पर्धियों के इस रणक्षेत्र में भिन्न-भिन्न बोलियों-भाषाओं का हंगामा मचा है… उधर चीनी रिक्शाचालक हथरिक्शा में साहब लोगों को बिठाए नंगे बदन, नंगे पैर सड़कों पर दौड़ रहे हैं. इंडिया के पंजाब प्रांत से आए सिख जागा, गोदामों की रखवाली कर रहे हैं. पूना से यहाँ पहुँचे सँपेरे बाजारों-गलियों में बीन बजाते घूमते हुए साँपों का खेल दिखा रहे हैं. अवध के ग्वाले साइकलों पर ड्रम लादे दूध बेच रहे हैं. औरतें फूलों के गजरे-गुलदस्ते लिए फेरी लगा रही हैं…
उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में सिंगापुर सचमुच ऐसा नक्कारखाना बन चुका था, जहां व्यापार-नाद के अलावा अन्य कोई तूती नहीं बजती थी. अति आदरणीय और प्रतिष्ठित ब्रिटिश व्यापारी से लेकर एक अदने फेरी वाले तक – सब व्यापार की महाकाय मशीन के पुर्जे थे. उठते-बैठते, सोते-जागते, वे सिर्फ व्यापार करते थे, व्यापार के बारे में सोचते थे.
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द्वीप के इस कायाकल्प को देखकर रेफल्स प्रसन्न तो था, लेकिन संतुष्ट नहीं था. उसकी योजना सफल हो चुकी थी लेकिन उस विशाल मायानगरी का निर्माण करना अभी बाकी था, जिसकी उसने कल्पना की थी. रेफल्स ने हर तरफ मची अफरा-तफरी को व्यवस्थित करने और दुनिया के विभिन्न हिस्सों से यहाँ आ जुटे जातीय समूहों को बसाने के लिए नगर योजना का खाका तैयार किया. परिणामस्वरूप यूरोपीय नगर, चीनी चुलिया और अरब कैंपौंग के अलावा लिटिल इंडिया भी बना, जहां भारतीय आप्रवासियों को बसाया गया. कैंपोंग-ग्लैम, चाइना टाउन और लिटिल इंडिया आज के सिंगापुर के ऐतिहासिक ज़िले हैं.
काल: वर्तमान
स्थान: लिटिल इंडिया
समय: दिन, तीसरा पहर
मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही लगता है, मानो सिंगापुर में घूमते-घूमते अचानक भारत के किसी इलाके में आ पहुँचे हों. जाने-पहचाने नाक-नक्श और वेशभूषा. तमिल, हिंदी, गुजराती से लेकर सिंधी और पंजाबी में हो रहे वार्तालाप के स्वर. छोटी-बड़ी दुकानों की कतारें, भीड़ भरे गलियारे. साड़ियों-लहंगों से भरे शोरूम. रेस्तराओं में भाँति-भाँति के भारतीय पकवान. फल-सब्जियाँ, मिर्च-मसाले, फूलों के गजरे खरीदती और हाथों पर मेहंदी लगवाती महिलाएँ… और इस समूचे वातावरण में गूंजते हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय गीत. कुछ ही दूरी पर श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर में उमड़ती भक्तजनों की भीड़ और श्रीरंगन रोड के गलियारे में कुर्सी जमाए, पिंजरे में तोता लेकर बैठा भविष्यवक्ता !
इस व्यस्ततापूर्ण और जीवंत वातावरण के बीच उभरती ‘स रे ग म’ की लय का पीछा करते हुए हम एक मकान की दूसरी मंज़िल पर बने ‘कला साधना विद्यालय’ पहुँचते हैं. भारतीय शास्त्रीय संगीत की कक्षाएँ चलरही हैं और लगभग चालीस विद्यार्थी दत्तचित्त होकर रियाज़ कर रहे हैं. साथ के कमरे में त्रिवेंद्रम वी. सुरेंद्रन, जो पालघाट टी. मनीअय्यर के शिष्य हैं, सफ़ेद- झक धोती-कुरता पहने, माथे पर चंदन लगाए मृदंग की ताल पर झूम रहे हैं. उनकी आँखें बंद हैं, होंठों पर मुस्कान है और उँगलियाँ मृदंग पर थिरक रही हैं. सामने बैठे शिष्य, द्रुत गति से नाचती उनकी उँगलियों को प्रशंसा से देखते हुए ताल पर सिर हिला रहे हैं. साथ के कमरे में तबलावादन की कक्षा चल रही है.
अचानक झमाझम बारिश शुरू हो जाती है. मैं खिड़की के पास खड़ा त्रिवेंद्रम वी.सुरेंद्रन से बात करते हुए बौछार में भीगती लिटिल इंडिया की रंग-बिरंगी इमारतों को देख रहा हूँ. इस इलाक़े की बनावट को मूल रूप में संरक्षित-सुरक्षित रखा गया है.दोमंज़िला ‘शॉप-हाउस, लंबे गलियारे, मेहराबें ढलवाँ छतें… और पृष्ठभूमि में बादलों तक उठी बहुमंज़िला इमारतें.
“अम अपने बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़े रखना चाहते हैं” खिड़की से अंदर आती
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फुहार से आनंदित होकर सुरेंद्रन कहते हैं, “और इस काम के लिए अमारा संगीत…आवर म्यूज़िक इज़ द मोस्ट इम्पार्टेंट इंस्ट्रुमेंट.”
सिंगापुर में बसे दक्षिण भारतीयों में अपने नाम से पहले अपने मूल स्थान का नाम जोड़कर लिखने-कहने का प्रचलन है. वे सिंगापुर के नागरिक हैं, लेकिन डेढ़ सदी के प्रवास के बाद भी भारतीय मूल के लोगों ने अपनी जातीय और सांस्कृतिक पहचान बनाए और बचाए रखी है. अपनी धार्मिक-सामाजिक परम्पराओं के प्रति भी वे अत्यंत सजग हैं और नयी पीढ़ी को इस विरासत से जोड़े रखने के लिए प्रयत्नशील हैं.
भारतीय मूल के लोग वास्तव में सिंगापुर सर्वप्रथम रेफल्स के साथ ही पहुँचे थे. रेफल्स जब समुद्री रास्ते से इस द्वीप पर पहुँचा, तो सौ से अधिक भारतीय सैनिकों और सहायकों का दल भी उसके साथ था. बाद में मद्रास,बंगाल, पंजाब और उत्तरप्रदेश से भारतीय यहाँ मज़दूरी, गोदामों में नौकरी और व्यापार करने के लिए उन्नीसवीं सदी के अंत तक पहुँचते रहे.
लिटिल इंडिया का मूल ढाँचा अगर उस इतिहास की याद दिलाता है, जब भारतीय मूल के लोगों को यहाँ बसाया गया, तो सिंगापुर में कुछ ऐसे स्थल भी हैं जहां इतिहास मूक है. प्रकट सिंगापुर के इन अप्रकट स्थलों को ढूँढना, चिन्हित करना पड़ता है. हर तरफ मची हाय-तौबा के बरक्स इन स्थलों पर गहरी शांति, हवा की रहस्यमय सरगोशियाँ और खंडहरों से झाँकते जादुई प्रतीक-चिन्ह हैं. जैसे सेंटोसा का उत्तर-पश्चिमी तट, जहां बिखरी प्रस्तर मूर्तियाँ किस आदिम सभ्यता का साक्ष्य हैं, यह रहस्य आज भी बना हुआ है. या फिर किसी प्राचीन नगर के वे अवशेष, जिनमें फ़ारसी और भारतीय वास्तुकला के अद्भुत मिश्रण की झलक मिलती है. इस स्थलों को देख कर लगता है, मानो समय की गति पर विराम लग गया हो और समूचा सिंगापुर एक छिटके हुए कालखंड में सिमट आया हो.
काल: वर्तमान
स्थान: सेंटोसा तट
समय: सुबह
तट का मुख्य रास्ता छोड़ कर हम पतली-सी पगडंडी की ओर बढ़ते हैं, जो बलखाती हुई पेड़ों के झुरमुट में गुम हो रही है. जैसे ही लंबे तनों वाले दरख़्तों तक पहुँचते हैं, लगता है मानो किसी तिलिस्मी लोक में प्रवेश कर गये हैं.
आकाश में घने बादल छाए हैं. कुछ देर पहले हो चुकी बूँदा-बाँदी के कारण जमीन गीली है. हवा में वनस्पति की महक है. पेड़ों के पत्ते घुलकर चटक रंग के हो गये हैं. हरियाली के इस घेरे में दूधिया-सा उजास फैला है और इस उजास में गीली-हरी घास पर कई मानव आकृतियाँ बेतरतीब बिखरी हुई हैं. चौड़ी-चपटी शिलाओं को तराश-तराशकर आँख, कान, नाक, मस्तक, होंठ गढ़े गये हैं. जमीन में गड़ी इन शिलाओं पर बनी आकृतियों को कलात्मक नहीं कहा जा सकता. वे अनगढ़ और बेढंगी हैं, लेकिन इन्हें देखते हुए अजीब सनसनी का-सा आभास
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होता है. आकृतियों के बीच घिरे खड़े होकर लगता है, मानो अभी उनकी आँखें झपकने लगेंगी, होंठ हिलने लगेंगे, किसी अनजान भाषा में ये आकृतियाँ बीते काल का रहस्य फुसफुसाने लगेंगी और यह सुप्त, स्थिर, स्तंभित-सा वातावरण खंड-खंड हो जाएगा.
इस वातावरण का असर ऐसा है कि नवनीत कैमरा भी संभल कर एक जगह टिकाता है और हम शॉट्सइस तरह गुपचुप तरीके से लेते हैं कि कहीं यह खामोशी भंग न हो जाए. गीली घास पर संभल-संभल कर आगे बढ़ते हैं, तो पेड़ों के पीछे खंडहर दिखाई देते हैं – भग्न दीवारें, चबूतरे, स्तंभ, गवाक्ष. पास पहुँचकर मैं आश्चर्य से देखता रह जाता हूँ. पत्थर की एक लंबी-चौड़ी शिला पर उत्कीर्ण फन उठाए, बलखाते नाग की आकृति, सूरज, चाँद, सितारों के रेखांकन, एक पैनल पर अन्यंत कारीगरी से अंकित तीसरे नेत्र की संकल्पना..! यह अद्भुत है – इस धरती पर, समुद्र तट की इस वीरान, निर्जन जगह पर इधर-उधर बिखरे भग्नावशेषों में भारतीय रूपक और मोटिफ देखना. मैं एक टीले पर बैठा, जाने कितनी देर तक कल्पना में उस नगर का खाका बनाता रहता हूँ, जिसके खंडहर मेरे आसपास बिखरे हैं.
अचानक बारिश शुरू हो जाती है. पथरीली दीवारें, टूटे स्तंभ, खंडित चबूतरे…सब चुपचाप खड़े, गिरती हुई बूँदों में भीगने लगते हैं. मैं भी इस मूक, अचल, विनष्ट नगर का हिस्सा बना बैठा, चुपचाप बूँदों की टप टप सुन रहा हूँ.
सेंटोसा की गिरफ़्त से छूटते ही सिंगापुर की मानो मूर्छा टूट जाती है. छिटके हुए कालखंड से बाहर आते ही फड़फड़ा कर अपने मौजूदा रूप में प्रकट हो जाता है. ऐसा सिंगापुर, जिसे अपने बीत चुके काल को संजोकर रखने की समझ तो है, लेकिन रुककर उस पर नजर डालने की फुर्सत नहीं. वह समय के विराम में अटकना नहीं चाहता, बल्कि समय की रफ्तार से भी तेज रफ्तार होने और बने रहने में यकीन रखता है. इसीलिए वह उन तमाम अवांछित चीजों को दरकिनार कर देता है, जो उसकी रफ्तार में रुकावट बनें. उसकी इस व्यावहारिक और व्यापारिक बुद्धि का ही परिणाम है कि आज सिंगापुर हथरिक्शा खींचते और कुलीकेंगों में अफ़ीम के नशे में डूबे रहने वाले चीनियों और दिन भर माल-असबाब ढोते और तंग बैरकों में ठुंसे, रातें गुज़ारने वाले भारतीयों का देश नहीं. वह बड़े-बड़े व्यापारिक संस्थानों के मालिकों और सिंगापुर की अर्थव्यवस्था में प्रमुख भूमिका निभाने वाले चीनियों का देश है; समृद्ध-संपन्न और सफल भारतीय व्यापारियों का देश है. सोने के आभूषणों से भरी दुकान के काउंटर पर चाक-चौबंद बैठा चीनी मालिक और चटक सफेद धोती-कमीज पहने, माथे पर टीका लगाए बगल में बैठा सलाह देता दक्षिण भारतीय उद्योगपति, किसी भव्य रेस्तराँ में कोने की मेज पर गहरी मंत्रणा में डूबे बैठे चीनी और भारतीय उद्योगपति, बाजार के नुक्कड़ पर गर्मजोशी से किसी नई योजना पर बात कर रहे चीनी और भारतीय साझेदार… ऐसे कई दृश्य अक्सर देखने को मिलते हैं, जिनसे किसी तरह की जातीय संकीर्णता या कटुता के बजाए भाईचारे की भावना ही लक्षित होती है. लेकिन इस भाईचारे का आधार भावप्रधान न होकर बुद्धिप्रधान होना ही ज्यादा
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संभव लगता है – जैसा कि रेफल्स द्वारा निर्मित किए गये देश के नागरिकों से उम्मीद भी की जानी चाहिए.
इस नज़रिये से सिंगापुर के प्रशासन और नागरिकों की सोच में बड़ा तालमेल दिखाई पड़ता है. बहुजातीय देश सिंगापुर के विभिन्न समुदायों के बीच सौहार्द और सामंजस्य बिठाए रखने के लिए सरकार ने शहरी नवीनीकरण कार्यक्रम लागू किया था, जिसके अंतर्गत अलग-अलग इलाक़ों में जातीय आधार पर बनी बस्तियों को खत्म करके नागरिकों को बहुजातीय, बहुमंज़िला रिहायशी इलाक़ों में बसाया गया था. यह बड़ी सकारात्मक और प्रगतिशील सोच थी. लेकिन असल मक़सद शायद यह था कि दक्षिण-पूर्व एशिया की प्रमुख मंडी के रूप में स्थापित हो चुके देश के नागरिक जाति, नस्ल, धर्म जैसी भावनाओं के पचड़ों में पड़ कर अपने मूल धर्म – व्यापार, को न भूल जाएँ. अव्वल तो ऐसी कोई संभावना होनी ही नहीं चाहिए, और अगर ऐसी भावनाएँ कभी जोर मारें भी तो उनकी सीमा जरूर निश्चित होनी चाहिए, ताकि किसी भी सूरत में, व्यापार में कोई अड़चन ना आए. सिंगापुर के नागरिक – वे भारतीय मूल के हों या चीनी या मलय मूल के या अन्य एशियाई – इतनी व्यावहारिक बुद्धि के हैं कि रेफल्स की पिलायी गई घुट्टी को न भूलें, अपने पूर्वजों द्वारा सिखाए गये तत्वज्ञान को हमेशा याद रखें.
नतीजतन व्यापार हो रहा है. हर जगह, हर समय. सोते-जागते, उठते-बैठते, हंसते-खिलखिलाते. बातों-बातों में. चुप्पी में भी. बेचो और खरीदो और बेचो के गुरूमंत्र का जाप बराबर हो रहा है.
काल: वर्तमान
स्थान: बोट-की
समय: ढलती शाम
दिन का काम निपटाकर हम बोट-की पर लौट आए हैं. यह तय किया गया था कि शाम हम ऐतिहासिक सिंगापुर नदी के किनारे बिताएँगे, जहां सुकून भी हो और सिंगापुर की भव्यता का नजारा जरा फासले से देख सकें.
नदी के तट पर हल्का अंधेरा धुएँ की तरह फैल रहा है. आसपास का सारा इलाका टिमकती हुई रोशनियों से भर गया है. तट के साथ-साथ बने पब्स, कैफ़े, रेस्तराओं में रोशनियों की दिप-दिप करती झालरें, आसमान में टंगी इमारतों पर रोशनियों की कसीदाकारी, पुल पर बनी रोशनियों की मेहराब, एल्पलेनेड पर रोशनियों का अर्धगोलाकार छत्ता… कृत्रिमता में भी कितना आकर्षण पैदा किया जा सकता है, यह इलाका इसका उदाहरण दे रहा है.
नवनीत चहलकदमी करने निकल गया है. मैं नीचे उतरकर पानी को छूती हुई सीढ़ी पर बैठ गया हूँ. नदी में पानी की लहरों पर बनते प्रतिबिंब सर्र-सर्र बहती हवा से थरथरा रहे हैं. मैं
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रोशनी से नहाये रेफल्स के बुत को देखता हूँ, जो गर्व से जगमगाती हुई इमारतों को देख रहा है. रेफल्स, जो सिंगापुर का नया प्रतीक है. जिसने अपने प्रपंच-कौशल से प्राचीन प्रतीक मरलॉयन को अपदस्थ कर दिया है. मरलॉयन, जो नदी के दूसरे किनारे पर श्वेत-शुभ्र, संगमरमरी पानी की चौहद्दी में बैठा है.
सैलानियों की एक टोली अचरज से इस मायावी रूप को देख रही है… और मरलॉयन मुँह बाए रेफल्स को ताक रहा है, जो ठीक उसके सामने चबूतरे पर, छाती ताने अकड़ कर खड़ा है !
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सुरेन्द्र मनन
चर्चित कथाकार और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित फ़िल्मकार. अनेक कहानी संग्रह, एक उपन्यास के अलावा ‘साहित्य और क्रांति’(लू-शुन के लेखन पर केन्द्रित),‘अहमद अल-हलो, कहाँ हो?’, ‘शिलाओं पर लिखे शब्द’, ‘हो-चि का कु-चि’ और ‘हिल्लोल’ (संस्मरण) प्रकाशित। ‘अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान-2022 से सम्मानित. विविध सामयिक विषयों पर महत्वपूर्ण फ़िल्मों के निर्माता, जो भारत में आयोजित विभिन्न फिल्म समारोहों के अतिरिक्त अनेक देशों के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शित. ‘इंडियन डाक्यूमेंट्री प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन’ द्वारा ‘गोल्ड अवार्ड’ और ‘सिल्वर अवार्ड’, ‘रोड्स अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सव’, ग्रीस, ‘सी.एम.एस.वातावरण अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह’ द्वारा ‘वाटर फॉर ऑल’ और ‘वाटर फॉर लाइफ’ अवार्ड, ‘स्क्रिप्ट इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ द्वारा विशेष जूरी अवार्ड से सम्मानित.

