अशोक अग्रवाल

सुप्रसिद्ध कवि और कहानीकार श्रीकांत वर्मा से पहला संपर्क उनके आलोचनात्मक लेखों के संग्रह ‘ज़िरह’ के प्रकाशन के सिलसिले में हुआ। धीरे-धीरे यह संबंध प्रगाढ़ता में तब्दील हो गया। वर्ष 1976 में उनका निर्वाचन राज्यसभा के लिए हो चुका था। नॉर्थ एवेन्यू के अपने आवास पर अक्सर मुझे आमंत्रित करते और अपने साथ मयपान का आग्रह भी। विदेश-यात्राओं के संस्मरण सुनाते हुए वह एक कुशल क़िस्सागो में रूपांतरित हो आते।
‘ज़िरह’ के प्रकाशन के समय वह साप्ताहिक ‘दिनमान’ में विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत थे। विशिष्ट कवि और कथाकार के रूप में अपना स्थान निर्मित कर चुके थे। ‘ज़िरह’ की लेखकीय प्रतियाँ उन्हें सौंपने ‘दिनमान’ के कार्यालय जाना हुआ। किताब के आवरण, मुद्रण और प्रस्तुति से वह काफ़ी प्रफुल्लित प्रतीत हुए। किताबों के पैकेट से एक किताब निकाल कर मुझे पकड़ाते, रघुवीर सहाय के केबिन की ओर इशारा करते बोले, “इसे अपनी ओर से उन्हें सौंप आओ। उनके चेहरे के भावों को यहीं बैठा महसूस कर रहा हूँ।” कुछ मेज़ों की दूरी पर अपनी कुर्सी पर बैठे सर्वेश्वरदयाल सक्सेना भी कनखियों से देखते हुए अनदेखा कर रहे थे। यह सभी हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि-कथाकार थे। उनकी यह पारस्परिक ईर्ष्या या प्रतिस्पर्धा मेरे लिए अबूझ पहेली की तरह थी।
वर्ष 1976 में राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित होने के बाद उन्होंने ‘दिनमान’ से त्यागपत्र दे दिया। 70 के दशक के उत्तरार्द्ध से 80 के पूर्वाद्ध तक कांग्रेस पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता के रूप में कार्यरत रहे। इन दिनों नॉर्थ एवेन्यू स्थित आवास पर कई बार जाना हुआ। वर्ष 1978 में उनकी विविध विधाओं में लिखी रचनाओं का संचयन ‘प्रसंग’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इसके आवरण का निर्माण सुप्रसिद्ध कलाकार मनु पारेख ने विशेष रूप से किया था।
आपातकाल के बाद केंद्र में जनता दल की सरकार के टूटने के बाद, जब देश में मध्यावधि चुनाव की घोषणा हुई, तो वर्ष 1980 में इंदिरा गांधी के राष्ट्रीय चुनाव-अभियान के प्रमुख प्रबंधक के बतौर श्रीकांत वर्मा ने कमान संभाली। ‘ग़रीबी हटाओ’ प्रसिद्ध नारे के सूत्रधार भी वही थे। इंदिरा गांधी की प्रचंड विजय में श्रीकांत वर्मा के आकर्षक प्रचार का भी योगदान था।
कांग्रेस की विजय के बाद भविष्य के मंत्रिमंडल में उनके नाम की चर्चा सभी समाचार-पत्रों में ज़ोर-शोर से हो रही थी। उस दिन संयोग से मैं श्रीकांत जी के निवास-स्थल पर मौजूद था। समाचार-पत्रों में अपने नाम की चर्चा से वह चिंतित और कुछ व्यथित प्रतीत हुए। उन्हें संस्कृति या शिक्षा विभाग के मंत्री के रूप में देखा जा रहा था। उन्होंने कहा, “यह मेरे विरोधी गुट का दुष्प्रचार है। मैं यह भली-भाँति समझ चुका हूँ कि मंत्रिमंडल से मेरा नाम काटा जा चुका है।” ऐसा ही हुआ भी। मंत्रिमंडल के बजाय उन्हें कांग्रेस संगठन के महासचिव पद पर नियुक्ति की घोषणा हुई। श्रीकांत वर्मा के मन के किसी कोने में संस्कृति या शिक्षा विभाग का मंत्रालय सँभालने की महत्त्वाकांक्षा छिपी रही होगी। उस अवसाद की छाया उनके चेहरे पर दिखाई दे रही थी।
यह वर्ष 1980 का कोई दिन रहा होगा। श्रीकांत वर्मा जी के आमंत्रण पर मैं उनके नॉर्थ एवेन्यू स्थित अपार्टमेंट पहुँचा। संध्या का समय हो गया था। श्रीकांत जी ने विदेश में निर्मित व्हिस्की की ख़ूबसूरत बोतल मेज़ पर रखी और दो पैग बनाए। कुछ दिन पहले वह यूरोप की यात्रा से लौटे थे। जिस देश की वह यात्रा करते, वहाँ की प्रसिद्ध शराब साथ लाना न भूलते। यह उनका पसंदीदा शौक़ था।
आधा घंटा व्यतीत हुआ होगा, जब कॉलबेल बजने पर घरेलू नौकर ने दरवाज़ा खोला। मैं आगंतुक को देख विस्मित रह गया। मेरे सामने गिरिराज किशोर खड़े थे। मैंने उनका सादर अभिवादन किया, जिसका उन्होंने प्रत्युत्तर दिया। श्रीकांत वर्मा उसी मुद्रा में अपने स्थान पर बैठे रहे। गिरिराज किशोर के अभिवादन का कोई उत्तर न देकर, ख़ामोशी से उनके हाथ से कुछ कागज़ पकड़ लिए। गिरिराज जी का चेहरा अत्यंत चिंतित और उदासी से भरा था। गिरिराज जी तुरंत, जैसे आए थे, वैसे ही वापस लौट गए।
मैं स्वयं को अत्यंत असहाय और असहज महसूस कर रहा था और श्रीकांत जी के यहाँ से उठने के बाद भी देर तक गिरिराज जी की वह मुद्रा मेरे सामने बनी रही। श्रीकांत वर्मा जी के लिए यह एक मामूली और रोज़मर्रा की सहज दिनचर्या रही होगी। मैं मन में आहत इसलिए महसूस कर रहा था कि गिरिराज जी मेरे वरिष्ठ और आदरणीय कथाकार थे। श्रीकांत जी की बेरुख़ी और उनकी गिरिराज किशोर जी के प्रति निस्पृहता ने मन में कचोट उत्पन्न करने का कार्य किया।
दरअसल, गिरिराज किशोर उन दिनों आईआईटी कानपुर के रजिस्ट्रार पद से बर्ख़ास्त चल रहे थे। उसी के संबंध में वह अपना टंकित आवेदन श्रीकांत वर्मा को पहुँचाने आए थे। उन्हें आशा रही होगी कि श्रीकांत जी कांग्रेस के प्रभावशाली महासचिव और प्रवक्ता हैं। उनके प्रभाव से संभावित है, उन पर आए संकट का कुछ समाधान हो जाएगा। श्रीकांत जी ने इस संदर्भ में गिरिराज जी की कोई सहायता की या नहीं, इसके बारे में मुझे कुछ नहीं मालूम।
उन दिनों श्रीकांत वर्मा साउथ एवेन्यू के एक बंगले में रह रहे थे। मेरठ कॉलेज के हिंदी प्राध्यापक डॉ. महेशचंद्र अपने एक मित्र के साथ हापुड़ आए। उनके मित्र मुरादाबाद ज़िले के सिविल जज थे और उनका परिवार कोयले के कारोबार से जुड़ा था। राँची की कोयला-खदान से मेरठ शहर लाने के लिए विशेष मालगाड़ी का आवंटन बहुत प्रयास के बावजूद नहीं हो पा रहा था। उन्होंने मुझसे श्रीकांत वर्मा से भेंट कराने के लिए कहा, जिसे मैंने स्पष्ट तौर पर ख़ारिज़ कर दिया, यह कहते हुए कि मैं किसी भी काम के लिए श्रीकांत वर्मा जी से नहीं कह सकता।
मेरे मना करने के बावजूद उन्होंने सिर्फ़ उनसे भेंट करवाने की बात की और मुझे आश्वस्त किया कि वह दोनों अपनी ओर से कुछ नहीं बोलेंगे। श्रीकांत वर्मा जी से फ़ोन पर उनसे मिलने के लिए समय माँगा, तो उन्होंने कहा—“तुम कभी भी चले आओ।”
अगले दिन वह मुझे अपने वाहन से दिल्ली ले गए। श्रीकांत जी से कुछ देर बातचीत करने के बाद वापस लौट आए। दोनों पूरी तरह ख़ामोशी से हमारी बातचीत को सुनते रहे।
कुछ दिन बाद महेशचंद्र का हापुड़ आगमन हुआ, तो मैंने पूछा कि उनके मित्र का कार्य हुआ या नहीं। उसका उत्तर मुझे चकित करने वाला था। उसने कहा कि अगले ही दिन दोनों श्रीकांत वर्मा जी के घर गए और उन्हें पार्टी फ़ंड के लिए दो लाख रुपए भेंट कर आए। उन्होंने रेल मंत्रालय के नाम अपना संस्तुति-पत्र लिखा और उनकी विशेष मालगाड़ी के आवंटन की माँग पूरी हो गई। यह मेरे लिए आश्चर्यजनक बात थी, और इस बात का संकेत भी कि धन और सत्ता का पारस्परिक संबंध कितना गहरा, रहस्यमय और अटूट है!
बाद के बरसों में श्रीकांत वर्मा इंदिरा गांधी जी के नज़दीक सफ़दरजंग लेन के विशालकाय बंगले में शिफ़्ट हो गए। उनकी विदेश-यात्राएँ अक्सर होती रहतीं। यात्रा से लौटने के बाद फ़ोन करके मुझे सूचित करने के साथ दिल्ली आने के लिए आमंत्रित भी करते। उनका यह मेरे प्रति सहज स्नेह-भाव था।
इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रति उनका विशेष रुझान था। मोबाइलों का प्रयोग भी अभी आमचलन में नहीं आया था। मयपान के दौरान उन उपकरणों को शिशु-सुलभ भाव से दिखाते और प्रसन्नता महसूस करते। आगामी प्रकाशन की योजनाओं के बारे में भी पूछताछ करते। रूस-यात्रा के उपरांत आन्द्रेई वोजनेसेंस्की की कविताओं के उनके अनुवाद की किताब ‘फ़ैसले का दिन’ शीर्षक से संभावना से प्रकाशित हो चुकी थी।
अपनी ऐसी ही विदेश-यात्रा के दौरान 25 मई 1986 के दिन न्यूयॉर्क में उनका निधन हो गया। उनकी आयु उस समय महज़ पचपन वर्ष की थी। इस अप्रत्याशित सूचना ने समूचे हिंदी संसार को स्तब्ध और शोकग्रस्त कर दिया।
वर्ष 1987 में उनके कविता-संग्रह ‘मगध’ को मरणोपरांत साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
श्रीकांत वर्मा की कविता ‘समाधि-लेख’ की कुछ पंक्तियों का स्मरण आ रहा है—
“कई साल
हुए
मैंने लिखी थीं कुछ कविताएँ
तृष्णाएँ
साल ख़त्म होने पर
उठकर
अबाबीलों की तरह
टकराती, मंडराती
चिल्लाती हैं।
स्त्रियाँ
पता नहीं जीवन में आती
या जीवन से जाती हैं।
आएँ या जाएँ!
अब मुझ में एक अंधे की तरह
पैरों की आहट
सुनने का उत्साह नहीं।
मैं जानता हूँ, एक दिन यह
पाने की विकलता
और न पाने का दुःख
दोनों अर्थहीन
हो जाते हैं।”
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अशोक अग्रवाल
लेखन में आधी सदी से अधिक समय से सक्रिय। कहानियाँ, उपन्यास, संस्मरण और यात्रावृतांत ने उन्हें एक अलग पहचान दी। अनेक कहानियाँ भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित, अनेक पुरस्कारों से सम्मानित। अब भी लेखन और अध्ययन में रत।

