एक (अ) साधारण रेल यात्रा

   ब्रिगेडियर सुशील तंवर

Brigadier Sushil Tanwar

रेलगाड़ियों ने अधिकांश लोगों के जीवन में अहम भूमिका निभाई है। पटरी पर सरपट भागती ट्रेन और सीटी बजाते भारी भरकम इंजन की छवि हम सब के दिलो-दिमाग में बेहद साफ़ तरीके से विराजमान है। 

ख़ैर अपना तो वैसे भी भारतीय रेल से एक ख़ास रिश्ता है। बचपन में ही घर से स्कूल, हॉस्टल तक जाने के लिए ट्रेन में सफर करने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो वो कई सालों तक निरंतर चलता रहा। उसके बाद भारतीय सेना में शामिल होने के बाद तो इंडियन रेलवेज़ के साथ ये नाता और भी गहरा होता चला गया।

हाँ, ये ज़रूर है कि पिछले कुछ सालों में ट्रेन से सफ़र करना लगभग ख़त्म ही हो गया है…ख़त्म होता चला गया।  यातायात के साधन भी बढ़ गए तो भागती ज़िन्दगी में वक्त की कमी लगने लगी और फिर कुछ सहूलतों की आदतें भी पड़ गई । बस इसलिए हमारा ज़्यादा से ज़्यादा सफर हवाई जहाज से होने लगा।

लेकिन पिछले दिनों जब राउरकेला जाने का मौका मिला तो अचानक दिल में ख्याल आया कि क्यों न भारतीय रेल का इस्तेमाल किया जाए, बचपन की कुछ स्मृतियों को ताज़ा किया जाए। मैंने कई बरसों से रेल में लंबा सफर नही किया था और फिर आजकल मुझे हवाई अड्डों के हाल और एयरलाइंस के नख़रों पर भी कुछ मायूसी-सी होने लगी थी। 

ये ख्याल पुख्ता इरादे में तब बदल गया जब हमने दिल्ली से राउरकेला के रेल मार्ग का अध्ययन किया। रास्ते में आने वाले स्टेशनों की सूची देख कर ही दिल खुश हो गया। मसलन मिर्जापुर जिसे, अमेज़न प्राइम पर आई वेब सीरीज ने वाइल्ड ईस्ट के रूप में मशहूर कर दिया। और चुनार जिसके तिलिस्मी किले की कहानी हमने बचपन में चंद्रकांता नामक उपन्यास में बड़े अचरज से पढ़ी थी। यह उपन्यास कभी भूलता नहीं और ना ही भूलता है इसके लेखक देवकीनंदन खत्री का नाम। आज भी चुनार का नाम सुनते ही महाराज शिवराज और उनके सेनापति क्रूर सिंह एकदम दिमाग में आ जाते हैं।

इतना ही नहीं,  अंग्रेजों का बसाया डाल्टन गंज और रामगढ़ कैंट याद आता है,  जहां इंडियन मिलिट्री अकादमी से पास आउट होने के तुरंत बाद हमें कुछ दिन के लिए सिख रेजिमेंट सेंटर भेजा गया था। पुरानी यादों का ये पिटारा मुझे सचमुच बहुत आकर्षक लग रहा था।

बस फिर क्या था। झट से मैंने अपना टिकट बुक कर दिया और शुरू हो गई सफर की तैयारी। कई सालों बाद मैं और भारतीय रेल फिर से एक साथ थे मानो कोई बचपन का दोस्त फिर साथ आ गया हो। 

हां, जोश जोश में मैने ये बिल्कुल ध्यान नहीं दिया कि ये भयंकर सर्दी के दिन हैं और ट्रेन सुबह साढ़े पांच बजे है। वो भी दिल्ली के सब्जी मंडी रेलवे स्टेशन से। 

सफर वाले दिन हम सुबह सुबह ठिठुरते-ठिठुरते पहुंच गए सब्जी मंडी। एक तो दिल्ली में ना जाने कितने रेलवे स्टेशन हैं। नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली सराय रोहिल्ला दिल्ली कैंट, हज़रत निजामुद्दीन, आनंद विहार और भी ना जाने कौन-कौन से। मगर फिर भी ये सारे हमारी भारी भरकम जनसंख्या के आगे कितने कम पड़ जाते है।

ख़ैर वैसे तो सब्जी मंडी स्टेशन इतनी सुबह-सुबह बहुत सुनसान लग रहा था। प्लेटफॉर्म पर हल्की-हल्की रोशनी और ऊपर से छाया हुआ घना कोहरा। ये सारा समां जैसे किसी अंग्रेजी थ्रिलर मूवी का सीन लग रहा था। लेकिन चारों ओर बेतरतीब फैली हुई गन्दगी ज़रूर भारतीयता का एहसास दिला रही थी।

फिर याद आया कि सालों पहले तो हम प्लेटफॉर्म पर पहुंच कर सबसे पहले रिजर्वेशन चार्ट चेक किया करते थे और ढूंढते थे कि हमारे आसपास कोई मोहतरमा (F भले ही १५ से ५० तक की उम्र की) की सीट हो लेकिन इस मामले में भी हमारी किस्मत हमेशा फूटी ही निकली। 

वैसे यहां तो आज कहीं पर भी आने जाने वाली ट्रेन और उनके डिब्बों की जानकारी वाले बोर्ड का कोई अता-पता ही नहीं था। ख़ैर हमें मज़ा तो खूब आ रहा था। सुनसान प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर ऐसा लग रहा था कि जैसे पूरे स्टेशन पर अपना ही राज़ है। 

जम्मू से आने वाली हमारी ट्रेन संबलपुर एक्सप्रेस के यहां रुकने का टाइम भी मात्र दो मिनट ही था। लेकिन मुझे अपनी फ़ौजी फिटनेस पर पूरा भरोसा था और शायद इसलिए ट्रेन में फुर्ती से दाखिल हो कर अपनी सीट ढूंढ़ने में ज़्यादा परेशानी भी नही हुई। हां, कोच के अंदर पहुंच कर ये मलाल ज़रूर हुआ कि हमें तो ऊपर वाली बर्थ मिली है। अब बच्चों की तरह खिड़की से झांक-झांक कर कैसे देख पाएंगे भला।

ज़्यादातर लोग सोए हुए थे। ये लाज़िमी भी था क्योंकि ट्रेन जम्मू से आ रही थी। वैसे सब सो रहे हों तो शांति होनी चाहिए लेकिन पूरा कंपार्टमेंट खर्राटों से गूंज रहा था। अलग-अलग तरह के खर्राटे। छोटे लंबे सीटी नुमा कभी लगातार, कभी रुक-रुक के लिए जा रहे खर्राटे। उस वक्त पहली बार हमने हेड फोन बनाने के लिए भगवान और विज्ञान का दिल से शुक्रिया अदा किया। 

वैसे ट्रेन की ये अपर बर्थ भी कमाल की जगह है। बेचारे बूढ़े वर्ग के लोगों या जरा तंदरुस्त तरह के यात्रियों को अगर ये बर्थ मिल जाए तो उनका आधा सफर तो इसको अदला बदली करने की कोशिशों में निकल जाता है। किसी भले मानुष ने मिन्नतें कबूल कर ली तो ठीक वरना उनका रहा सहा समय कभी खुद को तो कभी सामान को एडजस्ट करने में बीत जाता है। बड़ी मुश्किल से लोग इस किले को फतह कर पाते हैं। मेरे पास तो खैर कोई चारा नहीं था। मन ही मन सोचा कि वहां हमारे सैनिक बर्फीले पहाड़ चढ़ रहे है और इधर मैं इस अपर बर्थ से मायूस हो रहा हूं। 

 

थोड़ा वक्त गुज़रा तो चाय वाले, नाश्ते वाले, पानी वाले फेरी वाले, झाल मुड़ी वाले सब आने जाने लगे और ऐसा लगने लगा कि हम तो किसी चलते-फिरते बाज़ार में आ गए हैं। मुझे याद आया कि बरसों पहले हम पूरी ट्रेन में हसीन चेहरों को तलाशने यूं ही फिरा करते थे और जब हमें अपने ‘भारत एक खोज’ जैसे मिशन में कामयाबी मिल जाती थी तो कितनी जल्दी ये संदेश अपने बाकी साथियों तक पहुंचा देते थे ताकि सब हमारी खोज का दीदार का सके। हां, ये साफ़ कर देना ज़रूरी है कि हमने कभी किसी के साथ कोई बदमतीज़ी कतई नही की ।

उन मासूम दिनों की याद से अपना दिल खुश हो गया और हमने उम्र और ओहदे के हिसाब से बर्ताव करते हुए ट्रेन के आवारा चक्कर लगाने की बजाय एक किताब खोल ली। “तुम्हारी क्या औकात है, पीयूष मिश्रा”। बहुत ग़ज़ब की किताब है। आप भी ज़रूर पढ़िएगा। जाने माने बहुमुखी कलाकार पीयूष मिश्रा ने इस आत्मकथा में अपने जीवन की दिलचस्प घटनाओं को इतने मज़ेदार तरीके से पिरोया है कि उसे पढ़ कर कोई भी दंग रह जाए। इस किताब का बेबाकपन और उस पर पीयूष मिश्रा की ट्रेडमार्क रंगबिरंगी भाषा ने सचमुच दिल को लुभा लिया और मैं उन पन्नों के सहारे पीयूष मिश्रा की ‘इंपरफेक्ट दुनिया’ में खो गया। 

खैर थोड़ी देर बाद आगरा स्टेशन आया तो वहां से एक बूढ़े अंकल-आंटी चढ़े और नीचे वाली दो सीटों पर बस गए। वो इतना सामान लाए थे मानो सच में यहीं पर अपनी घर गृहस्थी बसा लेंगे! लेकिन मेरी नज़र तो उनके सामान में एक सुंदर सी टोकरी पर टिकी थी जो उन्होंने बिल्कुल सामने ही रख दी थी। थोड़ी देर बाद मेरा शक सही निकला । उसमें आलू पूरी अचार और जाने क्या-क्या था। दोनों मियां बीवी बड़ी तसल्ली से अपनी पेट पूजा करने लगे। उनके बातें करने का लहजा भी बिल्कुल ठेठ था।

मेरा दिल तो हाय बस इसलिए टूट गया कि खाते वक्त उन्होंने एक बार भी नहीं पूछा कि “बेटा तुम भी कुछ ले लो”। मन ही मन सोचा कि इंसानियत का तो ज़माना ही नहीं है। लेकिन फिर लगा कि शायद उन्होंने मेरी तरफ ऊपर देखा ही न हो। क्रिकेट के अंपायर की तरह उन्हें बेनिफिट ऑफ़ डाउट देते हुए हम वापिस अपनी किताब और संगीत की दुनिया में गुम हो गए। 

समोसे वाले की तीखी आवाज़ ने ज़माने की तरफ हमारा ध्यान वापिस खींचा तो हमने फटाफट किताब को अलग पटक कर गरम-गरम समोसे लिए और कागज़ की प्लेट में खतरनाक तरीके से तैरती हुई हरी चटनी को थाम लिया। 

फिर किसी बतौर नौसखिए जिमनास्ट नीचे उतरे और झट से अंकल-आंटी को भी थोड़ा-सा समोसा चखने का निमंत्रण दे डाला। बेचारे सज्जन दंपति पहले तो थोड़ा झेंपे और फिर उन्होंने प्यार से मना कर दिया। बस फिर क्या था बातों का सिलसिला शुरू हुआ, तो हर बात पर बात होने लगी। दुनिया में जंग के हालात से ले कर महंगाई की मार तक।

वो भी राउरकेला जा रहे थे। उनकी बेटी वहीं सपरिवार रहती थी। उनको ये जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि वहां हॉकी का बहुत बड़ा टूर्नामेंट हो रहा है और उस से कहीं  ज्यादा ताज्जुब ये सुन कर हुआ कि एक अकेला इंसान इतनी दूर अनजान शहर में सिर्फ मैच देखने के लिए जा रहा है। वो भी इतनी लंबे रेल यात्रा कर के।

दरअसल हॉकी से मुझे बचपन से ही लगाव है। हालांकि बोर्डिंग स्कूल में पहली बार हॉकी स्टिक का इस्तेमाल खेलने के लिए नहीं बल्कि हमारी पिटाई के लिए हुआ था। हमारे स्कूल में बेरहम सीनियर्स की ये सोच थी कि बिना पिटाई किए जूनियर्स की गलती सुधारने की गुंजाइश ज़रा कम है। लेकिन एक बार जब मैने हॉकी खेलना शुरू लिया तो इस खेल की ऐसी लत पड़ी कि हाकी का मैदान घर लगने लगा। थोड़ी बहुत महारत आ गई तो पहले स्कूल की हॉकी टीम और फिर मिलिट्री एकेडमी की हाकी टीम में भी मेरा चयन हो गया। हालांकि इतने सालों में ये गेम बहुत बदल गया है। अब हॉकी एस्ट्रोटर्फ पर खेली जाती है जिससे इसकी रफ्तार खासी तेज़ हो गई है। इस खेल के बहुत सारे नियम जैसे कि ऑफसाइड और फ्री हिट भी बदल गये हैं। लेकिन हॉकी को लेकर मेरा जज़्बा नहीं बदला और इसलिए तो इतनी दूर राउरकेला तक सिर्फ मैच देखने के लिए जाने का प्लान बनाया था। उन अंकल-आंटी को मैने हॉकी के बारे में कुछ समझाने की कोशिश की। लेकिन उनके चेहरे से साफ ज़ाहिर हो रहा था कि उन्हें ये सब अजीब लग रहा था।

वैसे साथ में सफर कर रहे अजनबी लोगों द्वारा पूछे गए ” आप क्या करते हैं ” के अलग-अलग जवाब देने में मुझे बहुत मज़ा आता है। कभी टीचर, कभी पत्रकार, कभी लेखक, कभी एनजीओ… इसी तरह मैं हर बार कुछ नया पेशा अपना लेता हूं। इन जनाब के लिए मैंने यूनाइटेड नेशंस का सहारा लिया लेकिन यू एन का नाम सुनकर भी उन्होंने ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। तब मुझे और भी ज्यादा यकीन हो गया कि हमारे विदेश मंत्री सही कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र (यू एन ओ) कि ना तो कोई भी मुल्क सुनता है और ना ही इज्ज़त करता है। 

ट्रेन में अलग-अलग आवाज़ों का शोर बरकरार था। जब लोग उठ गए तो उनके खर्राटों की जगह उनकी बातों के शोर ने ले ली। हालांकि मोबाइल का सिग्नल आंख मिचोली खेल रहा था मगर फिर भी कई लोग फोन पर चिल्ला-चिल्ला कर गुफ्तगू करने की कोशिश कर रहे थे। छह सात बच्चे किसी फिदायीन दस्ते की तरह यहां से वहां हड़कंप मचाने में लगे थे। कुछ यात्री जोर जोर से एक-दूसरे के साथ बातों-बातों में घर परिवार के सब मसले निबटा रहा थे। तब मुझे एहसास हुआ कि शायद सिर्फ नए नवेले प्रेमी ही आपस में फुसफुसाते हैं बाकी सब तो बिना किसी परवाह के बिंदास बतियाते हैं। और हम जैसे बेचारे लोगों का टाइम पास उनकी बातें सुनने-समझने में और ये सुन कर उनके बारे में मन गडंत अंदाजा लगाने में बहुत अच्छे से हो जाता है। 

वैसे और भी कई जरिया हैं वक्त बिताने के। जैसे दरवाजे पर खड़े हो कर अगले स्टेशन का इंतजार करना। सालों पहले तो हम दोस्तों के साथ दरवाजा खोल कर नीचे सीढ़ी पर बैठ घंटों गपियाते थे। लेकिन अब जरा एहतियात बरतने का दौर है। अपनी उम्र के हिसाब से भी और आजकल के माहौल के हिसाब से भी। सो हमने वो जोखिम उठाने की बजाय रास्ते में स्टेशन पर उतर कर भीड़-भड़ाके की भागदौड़ देखने का लुत्फ उठा लिया। एक महानुभाव तो कानपुर स्टेशन पर कुल्हड़ वाली चाय पीने के लिए उतरे और ना जाने क्या तलाश करने लगे कि ट्रेन ही छूट गई। दरवाज़े पर खड़े होकर मैंने उन्हें ट्रेन की ओर भागते हुए देखा तो सोचा कि डीडीएलजे ( दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे) के नायक शाहरुख खान की तरह अपना हाथ उनकी तरफ  बढ़ा दूं लेकिन ये भाई जान बहुत दूर थे। हाथ बढ़ाने के बजाए हमने दूर से हाथ हिला कर अलविदा करना ही ठीक समझा और वापिस अपनी बर्थ की तरफ लौट आए।

वैसे ट्रेन में सफर करने का सबसे बड़ा फायदा है कि इसमें आप टांग पसार कर सो सकते हैं। लेकिन जब इतनी लंबी यात्रा हो तो हम जैसे आलसी लोग भी भला कितना ही सो पाएंगे। मोबाइल नेटवर्क तकरीबन ना के बराबर होने के कारण हमें कभी शांति और कभी बेचैनी महसूस होती रही। “तुम्हारी औकात क्या है, पीयूष मिश्रा” आधी से ज़्यादा खत्म हो गई थी  लेकिन इस संबलपुर एक्सप्रेस को शायद अपने गंतव्य तक पहुंचने की कोई जल्दी नहीं थी। ये मोहतरमा तो इतना धीरे चल रही थीं कि वो भाई साहिब जो रात को कानपुर स्टेशन में छूट गए थे उन्होंने सुबह-सुबह चुनार जंक्शन पर फिर से ट्रेन पकड़ ली। 

ये ट्रेन सचमुच बहुत लेट चल रही थी। इसका थोड़ी बहुत देर होना तो ठीक था लेकिन दस घंटे भी कोई लेट होता है भला। वैसे तो हमें खुद भी कुछ ख़ास जल्दी नहीं थी। राउरकेला में हाकी टूर्नामेंट की शुरुआत अभी दो दिन दूर थी। ये ट्रेन आखिर इतना लेट तो नहीं हो सकती थी कि हमारा मैच ही छूट जाए। 

इलाहबाद मिर्जापुर सोनभद्र रांची सब पीछे रह गए और हर स्टेशन के साथ हमारा भूगोल का ज्ञान भी बढ़ता गया। मसलन पूरे मुल्क में सालों इतना घूमने के बाद अब हमें मालूम हुआ कि सोनभद्र उत्तर प्रदेश का सबसे दूसरा बड़ा जिला है और भारत का ऐसा अकेला जिला है जो चार अलग राज्यों की सीमा से जुड़ा हुआ है।  यानी बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से जुड़ा हुआ है उत्तरप्रदेश का ये विशाल जिला।

ये भी पता चला कि 1861 में छोटा नागपुर के डिप्टी कमिश्नर कर्नल डाल्टन के नाम पर बसे डाल्टनगंज का कई साल पहले नाम बदल कर राजा मेदिनी राय के सम्मान में मेदिनीनगर कर दिया गया है। हालांकि वहां के रेलवे स्टेशन को अब भी डाल्टनगंज ही कहते हैं। 

हां, एक बार फिर इस बात पर यकीन हो गया कि हर यात्रा में इंसान को कुछ ना कुछ ज़रूर सीखने को मिलता है। हमने थोड़ी देर दरवाज़े पर खड़े हो कर बाहर के नज़ारों का लुत्फ उठाया और फिर वापिस अपनी सीट पर आ विराजे। अभी पीयूष मिश्रा की आत्मकथा के कुछ पन्ने बचे थे तो हम फिर से उनमें खो गए।

जब कई यात्री अपना सामान बांधने लगे थे तो मुझे अंदाजा हुआ कि अब सफ़र खत्म होने को है। खैर हमारे पास ज्यादा सामान था नहीं तो हम आराम से लोगों को अपना-अपना सामान समेटते हुए देखने लगे।  कुछ बेहद हड़बड़ी में थे और कुछ हमारी तरफ आलसी। 

आखिरकार जब हम कई घंटों की देरी के बाद बेवक्त राउरकेला पहुंचे तो तब तक ये तो साबित हो गया था कि रेल के सफर में खाली वक्त तो बहुत है और एक अलग सा सुकून भी है l अलग अलग नज़रिए के बेशुमार लोगों से मुलाकात के मौके हैं लेकिन साथ में कुछ छोटी मोटी मुसीबतें भी हैं। मसलन हर इंसान को ट्रेन का खाना पसंद नहीं आता। कभी-कभी स्टाफ अड़ियल लगता है और हां, ट्रेन में सफाई रखने की बहुत ज़रूरत है खासकर टॉयलेट के मामले में। वैसे इन के रखरखाव में थोड़ा सुधार तो आया है मगर अब भी  इनकी हालत अक्सर इतनी खराब होती है कि अंदर घुसने की हिम्मत नहीं होती। कुल मिलाकर कुछ अनिश्चितताएं तो ज़रूर हैं मगर इस यात्रा में मज़ा भी है।

तो फिर आप सोच क्या रहें हैं। अपनी जरूरत और सहूलियत के हिसाब से किसी ट्रेन का चुनाव कीजिए। और दीजिए बस एक मौका भारतीय रेलवेज को आपकी सेवा करने का। 

लेकिन जैसे वो म्यूचुअल फंड वाले कहते है ना। टर्म्स एंड कंडीशंस एप्लाई।

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ब्रिगेडियर सुशील तंवर

वीएसएम, मिलिट्री स्कूल (अजमेर) और राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) के पूर्व छात्र हैं। 25 से अधिक वर्षों के करियर में से उन्होंने 14 वर्षों से अधिक का समय जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी (Counter Insurgency) माहौल में बिताया है। वह अत्यधिक विशिष्ट सैन्य सम्मानों से अलंकृत हैं और उन्होंने सूडान में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन (UN Peacekeeping Mission) सहित कई प्रतिष्ठित पदों पर अपनी सेवाएं दी हैं। ब्रिगेडियर तंवर नई दिल्ली स्थित ‘सेंटर फॉर एयर पावर स्टडीज’ (CAPS) के साथ एक वरिष्ठ अनुसंधान फेलो (Senior Research Fellow) के रूप में भी जुड़े रहे हैं। उनका कहानी संग्रह – ‘मुखबिर’ और उपन्यास – ‘अमन के फरिश्ते’ प्रकाशित हो चुके हैं।

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