अवधूता युगन-युगन हम योगी- अशोक सेकसरिया की दुनिया: छोटी बातों का बड़ा जादू 

शर्मिला जालान

29 नवम्बर 2014 को अशोक सेकसरिया का देहावसान हुआ था। उनके दिवंगत होने के बाद यह दूसरा लेख है। उनके साथ कुछ समय बिताने का सौभाग्य मिला। इस संस्मरण में छोटी–छोटी बातों के द्वारा उनको फिर याद कर रही हूँ । अपने जीवन व्यापर में फँसा-धंसा या लगा एक कृतज्ञ लेखक और कर भी क्या सकता है। 

मैं जिन वर्षों में अशोक जी से मिली, उन्हें कोलकाता से बाहर जाते हुए नहीं देखा। उनकी दुनिया बहुत अलग थी। जीवन अलग था। रहन अलग था। उनमें एक ख़ास तरह का फक्कड़पन था। वे घर बैठे दुनिया को अत्यंत गहराई और पैनी नज़रों से पूरी संवेदनशीलता के साथ देखते थे। बातों के तल में जाते थे। बनावट को समझते थे। लोगों के भीतर के भटकाव और बिखराव को देख लेते थे।

उनको जानने वाले और उनसे प्रेम करने वाले पूरे देश में थे। जो यह जानते थे कि अशोक जी ने विरल गद्य लिखा है। उन्होंने कहानियाँ, लेख, टिपण्णियाँ, कविताएँ और ढेरों पत्र लिखे हैं। अपने पिता सीताराम सेकसरिया की आजादी की लड़ाई के दिनों की डायरियों का ‘एक कार्यकर्त्ता की डायरी’ (ज्ञानपीठ से प्रकाशित) शीर्षक से संपादन किया है। सीताराम सेकसरिया का जीवन महात्मा गाँधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सुभाषचंद्र बोस, काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, रायकृष्ण दास, भागीरथ कनोडिया जैसे व्यक्तियों से जुड़ा रहा है | 

दक्षिण कोलकाता के पॉश इलाके, 16 लॉर्ड सिन्हा रोड़ के जिस मकान में उनका निवास स्थान था, वहाँ मेरा अक्सर जाना होता था। उनके कमरे में आँखों को चुभनेवाली सम्पन्नता नहीं थी। बल्कि आत्मीयता और सादगी थी। वे मुक्त मन से सोचते हुए, भावों से भरे हुए बातें करते थे। अशोक जी गए तो वह अड्डा भी छूट गया जो जमता था। पर जो बीत जाता है वह, पूरी तरह नहीं बीतता, स्मृतियों में बना रहता है।

पिछले वर्ष श्री संजय भारती ने काँचड़ापाड़ा में 29 नवंबर को अपने मकान- ‘अशोकायातन’ में उसी भाव के साथ अड्डे का आयोजन किया था जो पुराने दिनों में ले गया। 

अशोक जी को याद करती हूँ तो रोज की वे बातें याद आती है जिनके अर्थ बहुत गहरे थे। न जाने कितनी किताबें उनके कहने पर पढ़ी गईं। कितने लोगों से अशोक जी के प्रसंग से मिलना हुआ और अनुभव संसार बड़ा होता रहा।

कभी–कभी याद आता है कि अशोक जी कहा करते थे, ‘बातों का कोई अंत नहीं। उनमें से इतने तार निकलते हैं कि हैरत होती है और उन्हें लिखने की प्रबल इच्छा होती है , फिर लिखना असंभव जान पड़ता है और फिर एक हाड़ तोड़ने वाली थकान या थकावट महसूस होती है।’ कभी-कभी यह भी कहते थे कि ‘आदमी जानता है कि लिखकर क्या होगा ! कौन उसे समझेगा और उसको मूल्य देगा।’ वे एक साथ चकित भी थे तो उदास भी | 

फिर मैं यह भी देखती थी कि उनकी तबीयत एक डेढ़ महीने से लगातार खराब चल रही होती थी। बीच-बीच में बुखार आता-जाता रहता था। अंत में मालिगनेंट मलेरिया निकलता। मौसम पर भी उन सालों में उदासी छाई हुई थी। इतनी उमस और साथ में अशोक जी का यह कहना,‘कुछ नहीं रखा जीवन में। ’सितंबर 1998 में वे अस्पताल में भर्ती हुए। उनके चालीस वर्ष पुराने मित्र प्रबोध जी ने मुझे पत्र लिखा-– ‘तुम्हारे पत्रों से यह पता चल रहा है कि पूरे सितंबर महीने अशोक की तबीयत ठीक नहीं रही। ’प्रबोध जी क्षुब्ध होकर लिखते कि ‘वह चाहते हैं कि मैं और रमेश गोस्वामी वहाँ जाकर उनके नर्सिंग होम के अनुभवों की कहानी सुनें तो वैसा ही होगा। नवम्बर में हम आएँगे।’

प्रबोधकुमार जी कलकत्ता आना चाहते हैं यह सुनते ही अशोक जी उन्हें तुरंत पत्र लिखते – ‘कोलकाता अभी मुझे मालिगनेंट मलेरिया का महासमुद्र लग रहा है। मलेरिया के 100 मामलों में 40 मालिगनेंट मलेरिया हो गए हैं। मेरा घर भी शायद मालिगनेंट मलेरिया का एक बड़ा आश्रय स्थल बना हुआ है। बालेश्वर को मालिगनेंट हुआ है और भाई के ड्राइवर को भी हुआ। 15नवंबर तक मालिगनेंट मलेरिया के प्रभाव दूर हो जाने की संभावना है। तुम अगर 15 से पहले आए और ख़ुदा ना खस्ता तुम्हें मालिगनेंट हो जाता है तो मैं अपने मालिगनेंट से तो नहीं मरूँगा पर तुम्हारे मालिगनेंट मलेरिया से मर जाऊँगा। सो तुम 15 के बाद आना।’ अशोक जी के अंदर मन-मरापन हमेशा रहता था। ऐसा लगता है कि उन्हें यह अच्छा नहीं लगता था कि वे स्वस्थ हैं | 

यह भी याद आता है कि एक बार उनके भतीजे ने उन्हें बीमार होने पर जबरदस्ती अस्पताल में भर्ती कर दिया था और पीछे से उनके कमरे में रंग-रोगन करवा दिया। इस कारण वे अस्पताल से अपनी बहन के यहाँ चले गए। रंग-रोगन के कारण प्रबोध जी के छोटे पुत्र अर्जुन, जो उनके यहाँ रहकर होटल मेनेजमेंट का कोर्स कर रहा था, की छोटी सी तहखानानुमा कोई दराज फेंक दी गई और उन्हें वहीं सब सामान में अच्छी लगती थी, अपनी सादगी की वजह से। अर्जुन ने उन्हें लिखा कि उसे लगातार तीन दफे मलेरिया हुआ तो उसने 5 महीने लारियागो (हफ्ते में दो खाई) इसके बाद मलेरिया फिर नहीं हुआ। 

अगस्त 2000 में उनकी तबीयत खराब हुई। उनके भाई के लड़कों ने उन्हें डॉक्टर को दिखाया। साथ ही उनका रक्त परीक्षण भी हुआ। उन्हें ऐसा लग रहा था। ‘इस बार की जांच में कोई गंभीर बीमारी जैसे कि किडनी में कोई खराबी आएगी। फिर एक सिलसिला शुरु हो जाएगा। बोझ बन जाऊंगा।’

एक दिन जब मैं अशोक जी से मिलने गई रास्ते में सोच रही थी कि अशोक जी या तो ‘सामायिक वार्ता’ के लिए कोई अनुवाद कर रहे होंगे या रिजेंट के पैकेट से सिगरेट निकाल कर पी रहे होंगे पर वे माथे पर मसनद की खोली बांधे सोए हुए मिले। पता चला दो दिन पहले ईडन गार्डन मैच देखने गए थे। वहाँ से आने के बाद उनकी तबीयत खराब हो गई थी। फिर वे किसी तरह उठे थोड़ी देर बाद जब चाय पीकर फ्रेश हो गए तब अपने एक हाथ में कलम की खोल और दूसरे में रिफ़िल दिखाकर पूछने लगे यह दोनों किसकी है ? मैंने हंसते हुए कहा, यह एक कलम है। जिसकी खोल आपके एक हाथ में है और दूसरे में रिफ़िल। दोनों को अलग पकड़ कर आप पूछ रहे हैं ये दोनों किसकी है ! उन्होंने अपने दोनों हाथों को देखा और भोलेपन से कहा-अच्छा !

वैसे अशोक जी कभी-कभी यह कहते थे कि सिगरेट पीना उन्हें अखरने लगा है। पर ऐसा भी था कि वे अगर सिगरेट पीना छोड़ देते तो उनका लिखना, पढना, सोचना उसी अनुपात में कम हो जाता और उनका बहुत समय सिगरेट पीने के लिए बहाने ढूँढ़ने में खर्च हो जाता। 

वर्ष 2000 में अशोक जी की बड़ी बहन पन्ना बाई नहीं रहीं । इतना शारीरिक कष्ट पा रही थीं । बहन के जाने के बाद अशोक जी के गंदे नाखून अब कौन काटेगा यह चिंता मुझे सताने लगी और हर रविवार को देवकीनंदन खत्री, किशोरी लाल गोस्वामी के उपन्यास उठाए अशोक जी कहाँ जाएँगे ! अब कोई घर नहीं रहा जाने के लिए।

अशोक जी के पास मैंने बहुत वर्ष बिताए । बहुत वर्ष कब से कब तक थे । उनको अगर मैं देखती हूँ  तो 1992 में पहली बार अलका सरावगी मुझे उनके घर ले गई थीं । वे रघुवीर सहाय पर शोध कर रही थीं और 6 महीने के लिए श्री शिक्षायतन कॉलेज में पढ़ाने के लिए आई थीं। उनका पढ़ाने का ढंग गैर-पारंपरिक था। वे नया जो लिखा जा रहा है उस पर भी बात करती थीं। ‘वर्तमान साहित्य’ पत्रिका में छपी अपनी कहानी ‘आपकी हंसी’ के बारे में उन्होंने बताया। युवा लेखक अपनी रचना उन्हें देते तो वे पढ़ती और प्रतिक्रिया देती थीं। मैंने उन्हें अपनी तीन कहानी पढ़ने के लिए दी थीं | अलका जी ने उसमें से एक कहानी अशोक जी को पढ़ने के लिए दी। इस तरह कॉलेज के दिनों में 20-21 साल की उम्र में अशोक जी से पहली बार मिली थी। फिर कभी-कभी उनसे मिलने जाने लगी। जमशेदपुर से एक लघु पत्रिका निकलती थी ‘नारी संवाद’। रेणु दीवान उस पत्रिका को निकालती थी। उसमें मैंने अपनी वह कहानी भेजी। उस कहानी के बाद यूनिवर्सिटी के दिनों में मैंने एक कहानी लिखी और प्रभाकर श्रोत्रिय जी को वागर्थ पत्रिका के लिए दी। वह कहानी शीर्षक–‘तलाश’‘नई कलम’ कॉलम में प्रकाशित हुई। ‘नई कलम’ में कहानी प्रकाशित होने के बाद मेरे पास बहुत पत्र आने लगे। लंबे-लंबे पत्र और पोस्टकार्ड। पोस्टकार्ड आने का सिलसिला थमा ही नहीं। मैं उन पत्रों को अशोक जी को पढ़ाती। अशोक जी बहुत पढ़ने-लिखने वाले व्यक्ति थे। वे ढेरों पत्र लिखते थे। उनकी सूक्ष्म दृष्टि थी। मेरे पत्र पढ़कर वे कहते-जवाब दो। निर्मल वर्मा को याद करते, कहते- निर्मल जी पत्रों के जवाब गंभीरता से देते हैं। 

1993 से 1995 तक अशोक जी के यहाँ कभी-कभी ही जाती थी। लेकिन 97 के बाद 2001 तक ज्यादा समय बिताने लगी थी। 1998 से 2001 की अवधि में अशोक जी के प्रसंग से प्रबोध कुमार और रमेश गोस्वामी से पत्र व्यवहार शुरू हुआ। प्रबोध कुमार एंथ्रोपोलोजिस्ट थे और साठ के दशक में उन्होंने सुंदर कहानियाँ लिखीं। विजय मोहन सिंह ने अपनी पुस्तक ‘साठ के बाद की कहानियाँ’ में उन्हें शामिल किया था। जानने वाले जानते हैं कि प्रबोध कुमार मुंशी प्रेमचंद के नाती हैं।

अशोक जी के पास उनके मित्रों के बहुत पत्र आते थे। कुछ मैं भी पढ़ लेती थी। वर्ष 1999 सितंबर के महीने में रमेशचंद्र शाह का एक पत्र वे पढ़ रहे थे। शुरू की दो-तीन पंक्तियों वे पढ़ नहीं पा रहे थे क्योंकि शाह साहब की लिखावट महीन थी। उन्होंने मुझे पढ़ने के लिए दिया, पत्र में लिखा था-‘जीवन में बस यही दो इच्छा रह गई हैं -एक कयामत तक आपसे पत्र व्यवहार करता रहूँ, दूसरी आपके साथ अल्मोड़ा की सैर करने की।’

वे अक्सर हावड़ा स्टेशन जाते रहते थे। कोई आने वाला है, तो किसी को छोड़ने के लिए। उनके घर में कोई ना कोई आगंतुक ठहरा हुआ रहता। कला और साहित्य जगत के कई लोग जो उनके पुराने मित्र होते, उनके यहाँ आते रहते और कई बार वही रुक जाते थे। वे लोग उनसे रातभर बतियाते। उनके यहाँ आए हुए लोगों से हुई भेंटों और मुलाकातों से साहित्य पढ़ने का बार-बार मन करता। अशोक जी की बातें उकसाती रहती थी लिखने-पढ़ने के लिए।

पुस्तक मेले से मैं ‘टोपी शुक्ला’ उपन्यास खरीद लाई थी। क्या अद्भुत किताब थी। ‘द डायरी ऑफ़ ए यंग गर्ल’ :- ऐन फ्रेंक की डायरी की चर्चा तो उनसे पहले ही कर चुकी थी। 1995 में ‘मुझे चांद चाहिए’ पढ़ी। उन वर्षों में ‘नौकर की कमीज’ और ‘अंतिम अरण्य’ की चर्चा होती रहती थी। मई 1998 में शमशुल इस्लाम का लेख ईशनिंदा कानून पढ़ा था। उसकी कुछ पंक्तियां याद रह गयी – ‘ऐसे तत्व दिमागी तौर पर बीमार होते हैं।  वे न ही तो किसी तर्क और बहस में विश्वास करते हैं और ना ही किसी को अपने बराबर का समझते हैं। इन लोगों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि वे सिर्फ वे सही हैं |’

‘समरेश बसु’ का उपन्यास ‘कहां पाऊं उसे’ मैंने 1998 में पढ़ा था। सितंबर के महीने में मैं विभूति बाबू का एक उपन्यास ‘अपना पराया’ पढ़ रही थी। अनुवादक छेदीलाल गुप्त। एक जगह उसमें एक शब्द था ‘जलखई’। हमारे यहाँ दरभंगा का एक सेवक अक्सर कहता था जलखई (नाश्ता) करके आता हूँ। यह शब्द सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा। आशापूर्णा देवी का उपन्यास ‘स्वर्णलता’ पढ़ने लगी तो मैं हैरान हो गई। मध्यवर्गीय संयुक्त परिवार की ऐसी कौन-सी बात है जो लेखिका की नज़रों से ओझल है। ऐसा लगता है लेखिका को दिव्य चक्षु प्राप्त हैं। अनुवाद हंस कुमार तिवारी ने किया था। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ और ‘अनामदास का पोथा’ 1998 में पढ़ा  और सभी किताबों के बारे में अशोक जी से बात की। वे अपनी तरफ से बहुत प्रश्न करते और पढ़े पर चर्चा करते।

वर्ष 1999 में प्रयाग शुक्ल ने मुझे ‘स्मृति चित्रे ’ पुस्तक पढ़ने के लिए कहा था| उन दिनों अशोक जी महेंद्र भल्ला के उपन्यास की बात करते थे – ‘उड़ने से पेशतर’, ‘दूसरी तरफ’ , ‘दो देश और तीसरी उदासी’। भारतीय भाषा परिषद के भागीरथ कनोडिया ग्रंथालय से वे सभी उपन्यास लेने गई पर मुझे नहीं मिले। फिर बाद में वह उपन्यास उपलब्ध हुआ। अशोक जी के प्रसंग से ही महेंद्र भल्ला के उपन्यासों को पढ़ना हुआ और पत्र लिखना भी। महेंद्र भल्ला ने पत्रों का जवाब भी दिया। परिषद के पुस्तकालय से मैंने लेव टॉलस्टॉय का उपन्यास ‘पुनरुत्थान’ भीष्म साहनी का अनुवाद लिया।  अशोक जी के मित्र रमेश गोस्वामी ने अशोक जी को एक पुस्तक भेजी थे- लव लेटर्स ऑफ़ एंटन चेख़ोव , ओलगा नीपर (डियर राइटर डियर एक्ट्रेस) इसमें लगभग 471 पत्र संकलित हैं । जिनमें एक लाइन का टेलीग्राम भी है तो दो तीन पन्नों के लंबे पत्र भी। यह पत्र 1899 से 1904 तक के वर्षों के हैं। दोनों के बीच सबसे ज्यादा पत्र 1901 में लिखे गए। जिनकी संख्या इस किताब में 213 तक है। यह वह समय है जब ओल्गा चेखव की प्रेमिका से पत्नी बन गई थी। वह पुस्तक अशोक जी ने मुझे पढ़ने के लिए दी थी। मुझसे एक वरिष्ठ लेखक ने पढ़ने के लिए ली फिर वापस नहीं की।

भारतीय भाषा परिषद से तारा शंकर बंधोपाध्याय की किताब ‘गणदेवता’ और ‘आरोग्य निकेतन’ और ‘जलसा घर’ कहानी संग्रह लेकर आई। रमेश गोस्वामी कहते हैं ‘दोस्तोव्स्की’ और ‘ग़ालिब को पढ़ो। प्रबोध जी कहते हैं ‘विभूति बाबू’, ‘तारा शंकर बंधोपाध्याय’, ‘आशापूर्णा देवी’ को पढ़ो। अशोक जी के पास गांधी की किताबें बहुत होती थी। मुझे ‘हजारी प्रसाद द्विवेदी’ उन दोनों अच्छे लग रहे थे आज भी लगते हैं।

एक बार मैंने शबाना आजमी की फिल्म ‘फायर’ देख उन्हें कहा- शबाना मुझे अच्छी लगती हैं।  अशोक जी कुछ देर फिल्म पर मेरी राय सुनते रहे फिर बोले –शबाना आज़मी और नंदिता दास ‘टाइप’ हो गईं हैं। 

1999 के अक्टूबर महीने में भारतीय भाषा परिषद में दो दिन का कबीर महोत्सव हुआ। भव्य आयोजन। फूलों, अगरबत्तियों की सुगंध से गमकता परिषद। परिषद से आने के बाद मैंने अशोक जी को वहाँ के कार्यक्रम के बारे में उत्साह से बताया। इस तरह ऊपर लिखी बातों का आशय यह है कि  अशोक जी से साझा करने का उत्साह हमेशा बना रहता था। उनमें अदम्य जिज्ञासा थी। वे बहुत सी बातें अपनी तरफ से जोड़ते थे। 

मैं अक्सर सब्जी, फल और घरेलू सामान के लिए अपनी माँ के साथ भवानीपुर में स्थित जग्गू बाजार जाती थी तो एक दिन अशोक जी ने पूछा, यदु बाबू बाजार के बारे में कुछ जानती हो?  कुछ दिनों के बाद उनके पास सारी जानकारी लेकर गयी। मैंने उन्हें बताया, यह जग्गू बाजार रानी रासमणि के पोते के नाम पर है। रानी कोई उपाधि नहीं है। प्यार से रखा डाक नाम है जो उनकी मां ने दिया था। रानी रासमणि बहुत सुंदर थी। जिसने एक गरीब किसान के घर(1793-1861)में जन्म लिया था और धनी समृद्ध राजचंद्र से उनका ब्याह हुआ था। 40 वर्ष की अवस्था में विधवा होने के बाद अपने पति की तरह समाज के लिए कुछ करना चाहा। कलकत्ते से लगभग चार मील दूर गंगा के पूर्वीय तट पर दक्षिणेश्वर में काली मंदिर, काली महादेवी का मंदिर बनवाया। जिसमें पुरोहित का काम स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने किया था। ‘जान बाजार’‘ रासमणि बाजार’ भी रानी रासमणि ने बनवाया था | मेरी बातें सुनकर वे मुस्कुरा दिए।

अशोक जी की मनोवृत्ति ‘खोजी’ थी। वे कभी किसी रास्ते को लेकर, तो कभी किसी व्यक्ति को या किसी मकान में रहनेवाले को लेकर, कोई न कोई खोज करते रहते थे। कुछ नई , चमत्कारपूर्ण बातें साझा करते थे और ऐसे प्रश्न करते थे कि श्रोता भी खोज में रुची लेने लगता। वह उत्खनन करने वाले आदमी थे।

अशोक जी दिल्ली रह चुके थे। वहाँ के लेखकों पत्रकारों को उन्होंने परखा था। साहित्य और  जीवन की उनकी समझ गहरी थी। कभी-कभी वे कहते थे, जब मैं दिल्ली में अकेला रहता था एक रात कोई मेरे दरवाजे पर थाप दे रहा था।  मैं भावुक हो गया। मैंने सोचा मुझे कौन याद करेगा ! दरवाजा खोला तो सामने एक कुत्ता था।  उस दिन से वह उसे कुत्ते के लिए कभी बिस्किट तो कभी कुछ और खाने के लिए रख देते। बाद में उन्होंने उस पर एक कहानी लिखी-‘एक था रामू’। 

एक बार की बात है अशोक जी के एक मित्र जोगिन दा अपने कुछ बंगाली मित्रों से अशोक जी को  मिलवा कर स्वयं दिल्ली चले गए। वे सभी अशोक जी को बहुत मानते थे । अशोक जी ने उनसे यह वादा किया कि वे उन लोगों को हिंदी सिखाएंगे। हर शनिवार शाम 4:00 बजे कक्षा शुरू होती थी। दो शनिवार को चाय बिस्कुट के साथ हिंदी की शिक्षा शुरु हुई। बातें कम, पढ़ना ज्यादा । अशोक जी ने पहले ही प्रेमचंद की एक कहानी बहुत गंभीरता से पढ़ ली थी। दो शनिवार के बाद हिंदी कक्षा किसी कारणवश स्थगित हो गई। जोगिन दा जब भी आते बहुत सारे लोगों को लेकर आते थे और वे लोग और भी बहुत सारे लोगों से अशोक जी को मिलवाते रहते थे। उनमें से कुछ से मेरा मिलना, बात करना हो जाता था। इस तरह धीरे-धीरे एक ऐसा संसार बना जिसमें मन रमा हुआ था। वर्ष 2000 जनवरी में जोगेन दा अपनी एक मित्र डिंपल को अशोक जी से मिलवाने के लिए लेकर आए। वे तीनों चार घंटे तक बातें करते रहे। डिंपल कह रही थी, सारी गड़बड़ियों की जड़ पितृसत्तात्मक व्यवस्था है। वह यह भी कह रही थी कि विवाह संस्था ही बेकार है। सबसे पाक रिश्ता दोस्ती का है। दोस्ती-मित्रता जो एक दूसरे को आगे बढ़ाने में मदद करें, ऊपर उठाएं। विवाह करना यानी उस इंसान को गुलाम करने की कोशिश है जो आपसे बंध गया है|

फिर अशोक जी वर्ष 2000 में किशन पटनायक की उस किताब को ठीक करने में लगे थे जो राजकमल ने उन्हें डमी स्वरूप भेजी थी । 

वर्ष 2000 जुलाई की एक शनिवार को मैं अशोक जी के साथ गोर्की सदन में विमल राय की 1944 में बनी फिल्म ‘उदयेरपाथे’ देखने गई थी। उनके साथ वे बंगाली मित्र थे जिनको उन्होंने दो सप्ताह हिंदी पढ़ाई थी। 

1999 में अशोक जी अपने चालीस साल पुराने मित्र रमेश गोस्वामी के हॉलैंड जाने की बात सुनकर बोले, अगर रमेश हॉलैंड चला जाएगा तो मेरा क्या होगा।

उनको याद करते हुए गर्मियों की दुपहरी याद आती है तो शामें भी याद आती हैं। सूर्यास्त याद आता है। वे अक्सर अलग-अलग मन:स्थिति में रहते थे। कई बार उदास और विरक्त होते थे। कई बार गुस्से में रहते थे, कई बार दुखी तो कई बार बहुत उत्साही। उनको अलग-अलग ऋतु में देखने का भी आनंद था। सर्दी में वे अपनी बड़ी बहन पन्ना बाई की हाथ से बनाई हरे रंग की स्वेटर अक्सर पहने रहते थे तो गर्मियों में बांहवाली बनियान को कभी-कभी भिगोकर पहन लेते थे |

वर्ष 2000 मेंजब एक दिन मैं अशोक जी के पास गई तो मैंने देखा वे बहुत अच्छा कुर्ता पहने बैठे हुए हैंl मैंनेकहा-यह तो बहुत अच्छा है, तो वे बोले,‘ज्योत्सना जी बेकार ले आई। ’वही कुरता पहने वे उस दिन 11:30 बजे श्री प्रयाग शुक्ल से मिलने भारतीय भाषा परिषद के अतिथि गृह में गए। अशोक जी का कहानी संग्रह –‘लेखकी’ उन्हें बिना बताये प्रकाशित हुआ था। पहल अरविन्द मोहन ने की थी, भूमिका प्रयाग शुक्ल ने लिखी थी और दीपचंद जी ने वाग्देवी प्रकाशन से प्रकाशित किया था । प्रयाग जी ‘लेखकी’ की कुछ कॉपी लेकर आये थे। 

अशोक जी बोले,‘चलो! जल्दी चलो! वह आ गया होगा। ’रास्ते में संजय भारती को प्रयाग जी के लिए मीठा दही लाने दौड़ा दिया। प्रयाग जी को दही बगल में बैठकर प्रेम से खिलाया कहा‘ और डालो।’फिर धीरे से प्रयाग जी से पूछा-‘लेखकी’के लोकार्पण में और कौन-कौन आया था? प्रयाग जी ने कहा, कुंवरनारायण आए थे औ रबोले –‘अच्छा अशोक जी की पुस्तक है।’ उसी दिन पूरी रात ‘लेखकी’ की सभी कहानियां पढने के बाद अशोकजी बोले-‘मुझे शर्म से गड़ जाना चाहिए। कितनी ख़राब कहानियां हैं ’ मैंने भी ‘लेखकी ’पढ़ ली। मुझे वह संग्रह एक उपन्यास की तरह लगा। इतनी परिपक्व कहानियाँ 25 से 30 वर्ष की उम्र में अशोक जी लिख रहे थे। कुछ कहानियां बाद के वर्षों की भी हैं। हर कहानी के एक-एक शब्द सोचे-समझे हुए। इतना सधे हुए वाक्य ! कहीं पर भी वाक्य ढीले नहीं पड़े। अच्छी कहानियां। बहुत अच्छी।

अशोक जी अक्सर मुसलामानों के बारे में , पाकिस्तान , कश्मीर, बांग्लादेश के बारे में सद्भाव से सोचते रहते थे। 

पिछले 10 वर्षों में अशोक जी के बारे में कई तरह से सोचा है। उन्होंने जो जीवन जिया, जो उन्होंने चुना उसके प्रति समर्पित थे। उनमें बरसों की निष्ठा और गहरा धीरज था। उनका दैनिक जीवन बहुत साधारण था। वे बहुत सरल मन थे | किसी से बात करते हुए यदि उन्हें लगता कोई आहत हो गया है तो बार-बार उससे माफी मांगते थे।

अशोक जी की यादों का जीवन बहुत बड़ा है। उन्होंने जो वृक्ष लगाया था उसके कुछ पत्ते हैं हम।

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Sharmila Jalan
sharmilajalan@gmail.com

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