नीलिमा पाण्डेय

‘जो सैको’ ग्राफिक जर्नलिज्म के प्रमुख और सम्मानित चित्रकारों में से एक हैं। उनकी क्लासिक कृतियाँ ‘पलेस्टाइन’ और ‘फुटनोट्स इन गाजा’ संघर्ष क्षेत्रों की मानवीय, जटिल और दृश्य-समृद्ध रिपोर्टिंग के लिए विश्व-प्रसिद्ध हैं।
सन 2025 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘The Once and Future Riot’ 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों पर आधारित है। यह केवल एक स्थानीय घटना का वर्णन नहीं है, बल्कि राजनीतिक हिंसा की संरचना (mechanics), समुदायों के बीच गहराते तनाव, अफवाहों की भूमिका और लोकतंत्र में सांप्रदायिक हिंसा की पुनरावृत्ति की संभावनाओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
पुस्तक की पृष्ठभूमि में सैको का गहन शोध शामिल है। सैको 2014 में मुजफ्फरनगर गए और उन्होंने विभिन्न पक्षों पीड़ितों (ज्यादातर भूमिहीन किसान), जाट समुदाय के सदस्यों, मुस्लिम परिवारों, अधिकारियों, स्थानीय नेताओं और गवाहों से विस्तृत बातचीत की।
2013 के दंगों में लगभग 60 लोग मारे गए और करीब 60,000 लोग, मुख्य रूप से मुसलमान, विस्थापित हुए। छेड़छाड़ की एक छोटी सी घटना और उसके बाद हुई हत्याएँ तेजी से सांप्रदायिक हिंसा में बदल गई।
पुस्तक प्रतिस्पर्धी आख्यानों (competing narratives), भूमि विवादों, राजनीतिक ध्रुवीकरण और ऐतिहासिक संदर्भ (अयोध्या सहित) का दस्तावेजीकरण करती है। सैको लिखते हैं कि वे इस घटना को “an archetype of political violence” के रूप में समझना चाहते थे।
पुस्तक में सैको का एक महत्वपूर्ण सवाल है कि, “There are any number of reasons to have a riot, but why do they tend to break out before an election? It’s too much of a coincidence.”
ऐसे सवाल दंगों और 2014 के लोकसभा चुनावों के बीच के राजनीतिक संबंध को रेखांकित करते हैं।
एक अन्य जगह वे लोकतंत्र की ‘नज़ाकत’ पर चिंता जताते हैं, “A democracy that arouses violence may one day be overwhelmed by it.”
पुस्तक में सैको दोनों पक्षों की गवाहियों को जगह देते हैं और दिखाते हैं कि हिंसा के बाद लोग अपनी यादों को कैसे rationalise करते हैं। वे “she said, he said” की जगह साक्ष्यों, संदर्भ और संरचना पर जोर देते हैं।
पुस्तक का शीर्षक The Once and Future Riot स्वयं बयान करता है कि मुजफ्फरनगर जैसी घटनाएँ भविष्य के लिए एक चेतावनी या मॉडल हो सकती हैं। सैको का फोकस केवल मुजफ्फरनगर तक सीमित नहीं है; वे राजनीतिक हिंसा के वैश्विक पैटर्न, चुनावी लाभ के लिए ध्रुवीकरण, अफवाहों का हथियार बनना और नेताओं की भूमिका को उजागर करते हैं।
वह कहते हैं, “I wanted readers to come away with some questions and think about democracy and its relationship to electoral politics and why are we intertwining ourselves with violence.”
♦ प्रकाशन विवाद क्या है?
पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण (Metropolitan Books / Jonathan Cape) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध है। भारत में पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया द्वारा इसके वितरण की योजना थी, लेकिन प्रकाशक ने अंतिम चरण में इसे रद्द कर दिया। विवाद के मुख्य मुद्दे पुस्तक में शामिल भारत की सीमाओं (LoC) का नक्शा और कुछ अन्य सामग्री हैं।
सैको के अनुसार, प्रकाशक ने पाँच पृष्ठों में बदलाव की मांग की, जिसमें हिंदुत्व और सांप्रदायिक राजनीति पर उनके निष्कर्ष भी शामिल थे। सैको ने इसे स्वीकार नहीं किया।
इस संबंध में सैको की प्रतिक्रिया इस प्रकार है, “I think they’re finding excuses… It’s about how politicians use violence as a means of advancing themselves electorally.”
यह घटना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रकाशन की कानूनी-व्यावसायिक सतर्कता और संवेदनशील विषयों पर स्व-सेंसरशिप की बहस को जन्म देती है।
‘द वन्स एंड फ्यूचर रायट’ सैको की विशिष्ट शैली दृश्य पत्रकारिता, मानवीय चेहरों और संरचनात्मक विश्लेषण का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह हमें याद दिलाती है कि सांप्रदायिक हिंसा को समझने के लिए बहु-आयामी आख्यानों, तथ्यों और संदर्भ की ज़रूरत है, न कि सनसनी या एकपक्षीय व्याख्या की।
भारतीय पाठकों तक इसकी सीमित पहुंच लोकतंत्र में खुली बहस की आवश्यकता को और रेखांकित करती है। सैको की यह कृति न केवल 2013 की घटना का दस्तावेज है, बल्कि लोकतंत्र में हिंसा की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए एक बौद्धिक चेतावनी भी है।
***

डॉ. नीलिमा पांडेय
प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष
प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग
लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

